नैनीताल. उत्तराखंड का नैनीताल जिला मशहूर शिकारी जिम कॉर्बेट (Jim Corbett Birth Anniversary) की यादों से जुड़ा हुआ है. उनका जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में हुआ था. जन्म के बाद से ही जिम कॉर्बेट नैनीताल स्थित गर्नी हाउस में रहा करते थे. उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय नैनीताल के इसी घर में बिताया. जिम कॉर्बेट को नैनीताल में जीवंत रखने के लिए गर्नी हाउस को आज भी उनकी यादों के तौर पर सहेज कर रखा गया है. कॉर्बेट की नैनीताल से जुड़ी यादों को देखने के लिए आज भी देश-विदेश से लोग यहां पहुंचते हैं. हालांकि अधिकांश लोगों को गर्नी हाउस के इतिहास के बारे में जानकारी नहीं होती है.
नैनीताल निवासी और प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत लोकल 18 से खास बातचीत में बताते हैं कि जिम कॉर्बेट का जन्म नैनीताल में ही हुआ था. उनकी स्कूली शिक्षा नैनीताल के बिरला विद्या मंदिर से हुई, जिसे तब के जमाने में फिलेंडर स्मिथ कॉलेज के नाम से जाना जाता था. अपने जीवन का लंबा समय व्यतीत करने के बाद 17 साल की उम्र में जिम कॉर्बेट बिहार के मोकामा घाट चले गए. वहां उन्होंने फ्यूल इंस्पेक्टर के तौर पर नौकरी की. साल 1920 में कॉर्बेट नौकरी छोड़ नैनीताल वापस आ गए. इसी दौरान जब उत्तर प्रदेश से अविभाजित राज्य (उत्तराखंड) में आदमखोर बाघों ने लोगों को अपना निवाला बनाना शुरू किया, तो कॉर्बेट ने लोगों की रक्षा का जिम्मा उठाते हुए आदमखोरों का शिकार शुरू कर दिया. उन्होंने लोगों को सुरक्षित रखने के लिए कई आदमखोर बाघों को अपना निशाना बनाया. वह नैनीताल नगरपालिका के सीनियर वाइस चेयरमैन भी रह चुके हैं. 1921 के बाद वह नैनीताल के गर्नी हाउस में रहने लगे.
जिम कॉर्बेट की मां ने बनवाया था गर्नी हाउस
प्रोफेसर रावत बताते हैं कि गर्नी हाउस का निर्माण उनकी मां ने करवाया था. गर्नी हाउस से अभिप्राय किसी पुराने मकान के टूटने से उसके अवशेषों को निर्माण सामग्री के तौर पर उपयोग करके दोबारा बनाया गया नया घर, गर्नी हाउस कहलाता है. साल 1880 में नैनीताल की आल्मा हिल में भूस्खलन हुआ था, जिसके बाद जिम कॉर्बेट की मां ने साल 1881 में नैनीताल के अयारपाटा में पुराने भवन को तुड़वाकर नए भवन का निर्माण करवा, जिसे गर्नी हाउस के नाम से जाना जाता है.
नैनीताल में जिम कॉर्बेट के माता-पिता की कब्र
वह आगे बताते हैं कि नैनीताल के सूखाताल में स्थित सेंट जॉन्स चर्च से लगे कब्रिस्तान में जिम कॉर्बेट के माता-पिता की कब्र आज भी है. इस कब्रिस्तान में कुमाऊं के पहले कमिश्नर ल्यूशिंगटन की कब्र भी मौजूद है. गर्नी हाउस से लगा कब्रिस्तान भी ऐतिहासिक है, जिसका निर्माण साल 1842 में हुआ था. हालांकि तब नैनीताल का नगरीकरण प्रारंभ हो चुका था. उस दौर में जिन अंग्रेजों की मृत्यु होती थी, उनको गर्नी हाउस के पास के कब्रिस्तान में दफनाया जाता था.
पर्यटकों की नजरों से ओझल अमूल्य धरोहर
जिम कॉर्बेट के जीवन से जुड़ी कई अहम चीजें आज भी गर्नी हाउस में रखी हैं. साल 1947 में देश के आजाद होने के बाद जिम कॉर्बेट केन्या में जाकर बस गए थे. जिसके बाद से उनके घर गर्नी हाउस को वर्मा परिवार ने खरीद लिया था. जिसके बाद से यह परिवार आज भी कॉर्बेट की विरासत और उनकी चीजों को संजोए हुए है. खास बात यह है कि जिम कॉर्बेट केन्या चले जाने के बाद भी अपने दिल से नैनीताल को नहीं निकाल पाए थे. जिम कॉर्बेट केन्या में रहते हुए हमेशा नैनीताल को याद किया करते थे. यहां तक कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी कब्र पर उनके मूल पते के रूप में नैनीताल का नाम दर्ज किया गया है. इससे पता चलता है कि जिम कॉर्बेट मरते दम तक अपनी जन्मभूमि यानी नैनीताल को याद करते रहते थे. भले ही जिम कॉर्बेट का जन्म नैनीताल में हुआ हो लेकिन आज उनकी जन्मस्थली पर्यटकों की नजरों से ओझल है. इस ऐतिहासिक इमारत (अब प्राइवेट प्रॉपर्टी) में पर्यटकों और स्थानीय लोगों का प्रवेश वर्जित है. लोगों ने इसे जनता के लिए खोलने की मांग की है.
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FIRST PUBLISHED : July 25, 2024, 15:04 IST
