पिथौरागढ़ के विकास से जुड़ा है शहर के इकलौते चर्च का इतिहास, 1879 में हुई थी स्थापना


हिमांशु जोशी/ पिथौरागढ़. उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ को विकास की राह पर ले जाने में मिशनरीज़ का बहुत बड़ा योगदान रहा है, जिन्होंने यहां लोगों के स्वास्थ्य उपचार और शिक्षा से जोड़ने की शुरुआत की. यह वह दौर था जब देश में ब्रिटिश शासन था और ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों की हुकूमत देश में चलती थी लेकिन इस से परे इस समुदाय के बहुत से लोग सेवा भाव से भी भारत आए, जिन्हें मिशनरी कहा गया.

मिशनरी से जुड़े लोग जब पिथौरागढ़ पहुंचे, तो उन्होंने यहां पाया कि यहां के लोगों का जीवन और रहन-सहन काफी कष्टकारी था. समाज में फैली कुरीतियों और प्रथाओं से यहां के लोग बंधे हुए थे, जिसे दूर करने के लिए पिथौरागढ़ में जॉन हेनरी बडन ने 1870 में मिशन केंद्र की स्थापना की. इस केंद्र के माध्यम से सबसे पहले यहां के लोगों को शिक्षा से जोड़ने के लिए 1871 में स्कूल खोले गए. इससे पहले यहां शिक्षा ग्रहण करने के कोई साधन नहीं था. उसके बाद यहां के लोगों के लिए 1885 में अस्पताल बनाया गया, फिर उसके बाद 1879 में शहर के बीच में सिल्थाम पर मेथोडिस्ट चर्च की स्थापना हुई, जिसके इतिहास के बारे में आज हम बात कर रहे हैं.

1879 से लगातार होती है यहां प्रार्थना
इस चर्च का इतिहास मिशनरी के पिथौरागढ़ पहुंचने के साथ ही जुड़ा हुआ है. जिसके बारे में जानकारी देते हुए पिथौरागढ़ के स्थानीय निवासी और शिक्षक एस के हीबर ने बताया कि पिथौरागढ़ को प्रगतिशील बनाने में मिशनरीज़ का सबसे बड़ा योगदान रहा है, जो सिर्फ अपने तीन मकसद लेकर पिथौरागढ़ पहुंचे थे. पहला था शिक्षा, दूसरा स्वास्थ्य और तीसरा ईसाई धर्म का प्रचार. इन तीनों मकसदों को पूरा करने के बाद ही मिशनरी के लोग यहां से वापस अपने वतन लौट गए. उन्होंने बताया कि आज भी उनकी सोच को आगे बढ़ाने के लिए लोग पिथौरागढ़ के सेंट्रल मेथोडिस्ट चर्च में इकट्ठा होते हैं और मानव कल्याण के लिए 1879 से लगातार इस चर्च में प्रभु यीशु से प्रार्थना करते हैं.

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