शिक्षक से शिकारी! लखपत सिंह रावत पर बन रही फिल्म, हेमंत पांडे आएंगे नजर


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Lakhpat Singh Rawat Film: राजधानी देहरादून से तकरीबन 350 किमी दूर गैंरसैंण के ग्वाड़ मल्ला के रहने वाले लखपत सिंह रावत शिक्षक से शिकारी बने. उनके 12 छात्रों को बाघ ने अपना निवाला बनाया था.

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लखपत सिंह रावत गैरसैंण के रहने वाले हैं.

देहरादून. पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या है. पहाड़ों में मूलभूत सुविधाओं की कमी और वन्यजीव और इंसानों के बीच संघर्ष के चलते भी पलायन होता है. पर्वतीय जिलों में हर साल बाघ और गुलदार दर्जनों लोगों की जान ले लेते हैं. इनसे लड़कर साहस की मिसाल पेश की थी लखपत सिंह रावत ने, जिनपर अब फिल्म बनने जा रही है. इस फिल्म में बॉलीवुड एक्टर हेमंत पांडे नजर आएंगे. फिल्म का नाम ‘ए बोई बाघ’ है. यह फिल्म गढ़वाली, कुमाऊंनी और हिंदी में रिलीज होगी.

लखपत सिंह रावत मूल रूप से गैरसैंण के रहने वाले हैं और सेवानिवृत्त शिक्षक हैं. उनके स्कूल के 12 बच्चों को बाघ ने मार दिया था. इसके बाद साल 2001 में वह कलम-किताबें छोड़कर शिकारी बन गए और उन्होंने 53 बाघ-तेंदुओं को मार गिराया. फिल्म के लीड एक्टर हेमंत पांडे ने लोकल 18 से बातचीत में कहा कि जिस तरह कश्मीर में आतंकियों ने हमला किया है, उसी तरह का आतंक पहाड़ में आदमखोर बाघ-तेंदुओं का होता है. वे कितने ही लोगों को अपना निवाला बना लेते हैं. यही वजह है कि उनके खौफ से लोग पलायन कर जाते हैं.

पहाड़ के गांवों में रहते हैं असली हीरो
उन्होंने कहा कि आदमखोर जानवर अब आबादी की ओर भी आने लगे हैं. पहाड़ों में देखा जाता है कि एक मां अपने बच्चों को पीठ पर बांधकर बर्तन धो रही होती है और बाघ उसके बच्चे को ले जाता है. हम मुंबई में फिल्मों में अभिनय निभाते हैं लेकिन हमारे पहाड़ के गांवों में असली हीरो रहते हैं, जिनके योगदान का उल्लेख सभी के सामने होना जरूरी है. अभिनेता ने कहा कि आज जिम कॉर्बेट को मशहूर शिकारी के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने 31 साल में 33 बाघ मारे थे लेकिन पहाड़ के शिकारी लखपत सिंह रावत, जो शिक्षक थे, उन्होंने 53 आदमखोरों का शिकार किया था. 12 छात्रों पर बाघ के हमले के बाद वह कैसे शिकारी बने, इसपर फिल्म बन रही है.

शिक्षक से कैसे बने शिकारी?
राजधानी देहरादून से करीब 350 किलोमीटर दूर गैंरसैंण के ग्वाड़ मल्ला के रहने वाले लखपत सिंह रावत शिक्षक से शिकारी बने थे. उनके 12 स्टूडेंट्स को बाघ ने अपना निवाला बनाया था. लखपत सिंह के दादा लक्षम सिंह ब्रिटिशकाल में शिकारी थे. सेना से रिटायर होने के बाद भी अंग्रेज उन्हें शिकार के लिए बुलाया करते थे. उनके तीन चाचा फौज में थे. 12 बच्चों पर बाघ के हमले से उनका मन विचलित हुआ और उन्होंने शिकारी बनने का फैसला किया. अब जब भी कभी आदमखोरों के आतंक से लोग परेशान होते हैं, तो उन्हें ही बुलाया जाता है.

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