पर्यावरण बचाने वाला 'बीज बम' अभियान, 18 राज्यों में जुड़े 1 लाख से ज्यादा लोग
देहरादून. उत्तराखंड में पर्यावरण को बचाने के लिए समय-समय पर आंदोलन होते आए हैं. जंगल और जमीन बचाने के लिए स्थानीय लोग अभियान चलाते रहते हैं. उत्तराखंड के पहाड़ों में जंगलों के सिमटने के बाद जंगली जानवर अब आबादी की ओर जा रहे हैं और दहशत फैला रहे हैं. वहीं अगर दूसरी ओर जंगल बचे रहेंगे, तो जंगल में रहने वाले शाकाहारी और मांसाहारी जानवरों को वहीं भोजन मिल पाएगा और इससे मानव जीवन भी सुरक्षित रहेगा. इसी मकसद के साथ 2017 में उत्तराखंड के द्वारिका प्रसाद सेमवाल ने बीज बम अभियान की शुरुआत की थी, जो आज देश के 18 राज्यों में चल रहा है. देहरादून में भी पर्यावरण बचाने के लिए बीज बम सप्ताह की शुरुआत हुई है, जो 15 जुलाई तक चलेगा.
पर्यावरणविद् द्वारिका प्रसाद सेमवाल ने लोकल 18 से बातचीत में कहा कि बीज बम अभियान उन्होंने साल 2017 में शुरू किया था क्योंकि वह उत्तराखंड के जंगलों की लगातार घटती हुई संख्या को देखकर चिंतित होते थे. जंगलों को बचाने के लिए सामूहिक रूप से लोगों को एक साथ ऐसे कदम उठाने की जरूरत थी, जिससे खत्म हो रहे जंगल और उसमें रहने वाले वन्यजीवों को बचाया जा सके. 2020 से उन्होंने बीज बम अभियान सप्ताह मनाना शुरू किया. वन्यजीवों और मानव संघर्ष कम करने की दिशा में हर साल यह अभियान 9 जुलाई से 15 जुलाई तक चलाया जाता है.
18 राज्यों में पहुंचा बीज बम अभियान
उन्होंने बताया कि मिट्टी कंपोस्ट और पानी मिलाकर गोले बनाए जाते हैं, जिसमे बीज रखे जाते हैं और उन्हें जंगलों में फेंक दिया जाता है ताकि बरसात के इस मौसम में वह ठीक से अंकुरित होकर फल-फूल सकें. वह ज्यादातर फलों के बीजों को इनमें रखते हैं ताकि मानव को फल, जंगली जानवरों को आहार मिल सके और हरियाली को बचाया जा सके. उनका मानना है कि जंगली जानवरों का आगमन अब बस्तियों में हो रहा है, इसकी वजह यही है कि उनका घर कहा जाने वाला जंगल अब खत्म होता जा रहा है और न ही उन्हें भोजन मिल रहा है. इसलिए इस अभियान की जरूरत है. उन्होंने कहा कि साल 2017 में शुरू किए गए इस अभियान में उत्तराखंड सरकार के साथ कई संगठनों ने मिलकर इसे सफल बनाया है. उत्तराखंड में शुरू हुए इस अभियान की तर्ज पर देश के 18 राज्यों में बीज बम अभियान चलाया जा रहा है और तब से अब तक एक लाख से ज्यादा लोग इस अभियान से जुड़ चुके हैं.
भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं बच्चे
द्वारिका प्रसाद सेमवाल का कहना है कि इस अभियान के तहत हम स्कूल-कॉलेज में जाते हैं क्योंकि छोटे बच्चे बीजों को अंकुरित होता देख उसे बड़े पेड़ के रूप में बढ़ता हुआ देखते हैं, तो भावनात्मक रूप से उससे जुड़ते हैं. उनका कहना है कि भविष्य के रूप में हम बच्चों और युवाओं को देखते हैं, इसीलिए उनको इस अभियान से जोड़ना बहुत जरूरी है.
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FIRST PUBLISHED : July 11, 2024, 15:25 IST