बचपन में नहीं देखा स्कूल, अब लोग करते हैं उनकी कविताओं पर रिसर्च, जानें शेरदा 'अनपढ़' की कहानी


रोहित भट्ट/ अल्मोड़ा. उत्तराखंड की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पर्यटन नगरी अल्मोड़ा को बुद्धिजीवियों का शहर भी माना जाता है. ऐसे कई महान लेखक और कवि रहे हैं, जिनकी यह जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है. आज हम आपको ऐसे महान लेखक और कवि के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी लिखी कुमाऊंनी कविताओं से सभी को हैरान किया था. कुमाऊंनी कविताओं के विकास में इनका अहम योगदान है. इस शख्सियत का नाम है शेरदा ‘अनपढ़’. शेरदा का जन्म 3 अक्टूबर 1933 को अल्मोड़ा के मालगांव में हुआ था.

शेरदा की कुमाऊंनी कविताओं में आपको पहाड़ के जीवन, पहाड़ के लोग और पहाड़ के दर्द के बारे में पढ़ने के लिए मिलता है. मजे की बात तो यह है कि शेरदा अनपढ़ ने कभी स्कूल की चौखट पर कदम तक नहीं रखा था. पर उनकी कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है मानो किसी बड़े लेखक ने इन कविताओं को शब्द जाल में पिरोया है. स्कूल न जाने की वजह से ही उन्हें अनपढ़ उपनाम मिला.

नहीं गए कभी स्कूल
दरअसल, शेरदा अनपढ़ एक महान लोक लेखक और कवि थे, जिन्होंने अपनी कुमाऊंनी कविताओं के जरिए पहाड़ों के जनजीवन के बारे में बताया. करीब 300 से भी ज्यादा कुमाऊंनी कविताएं उन्होंने लिखी थी. शेरदा के बेटे आनंद बिष्ट ने कहा कि उनके पिता कभी स्कूल नहीं गए पर जब वह छोटे थे तब अल्मोड़ा में उन्होंने एक शिक्षिका के घर में नौकरी की थी. शिक्षिका ने उन्हें मौखिक शिक्षा दी. कुछ समय के बाद वह फौज में भर्ती हो गए, जहां से उन्होंने थोड़ी बहुत शिक्षा ग्रहण की. फौज में करीब 10 साल नौकरी करने के बाद उन्हें टीबी की बीमारी हो गई और वह वापस आ गए. उसके बाद उन्होंने कुमाऊंनी कविताएं लिखना शुरू किया. कुमायूं विश्वविद्यालय में शेरदा की कविताएं पढ़ाई जाती है साथ ही उनकी कविताओं साहित्य पर कई शोध किये जा चुके हैं.

पाठ्यक्रम में शामिल शेरदा की कविताएं
उन्होंने आगे कहा कि उनके पिता ने गीत और नाटक प्रभाग नैनीताल में कवि और आर्टिस्ट के रूप में भी काम किया. उनके द्वारा लिखी गई कुमाऊंनी कविताएं दिल को छू जाती हैं. जब वह अपने पिता को देखते थे, तो वह कई घंटों तक पेड़ के नीचे बैठ बस लिखते रहते थे. उनकी कविताएं पहाड़ के जीवन में रहती थी. उन्होंने कुमाऊंनी कविताओं को काफी आगे बढ़ाया. उनके द्वारा लिखी गई कई कुमाऊंनी कविताएं डिग्री कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल की गई हैं.

कुमाऊंनी भाषा में 6 किताब
कविताओं के अलावा उन्होंने 6 कुमाऊंनी भाषा में किताब भी लिखी थी. इनके नाम हैं- जाँठिक् घुडुर्, ये कहानी है नेफा और लद्दाख की, शेरदा समग्र, फचैक के बहाने, दीदि-बैंणि और मेरि लटि-पटि. 20 मई 2012 को शेरदा अनंत में विलीन हो गए.

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