10 साल में एक बार होती है अस्कोट-आराकोट यात्रा, जानें कितना बदला उत्तराखंड?
देहरादून. उत्तराखंड की जानकारी को लेकर कई संस्थाएं काम करती हैं. उन्हीं में से एक है पहाड़ संस्था, जिसके सदस्य 10 साल में एक बार अस्कोट-आराकोट अभियान के तहत गढ़वाल के एक छोर से कुमाऊं के दूसरे छोर तक यात्रा करते हैं. इसकी विशेषता होती है कि इसमें सदस्य जिन-जिन गांवों में जाते हैं, उन्हीं से मांगकर खाना खाते हैं. स्थानीय लोगों की दिक्कतें, पहाड़ में सड़क, पानी, रोजगार जैसी समस्याओं को जाना और समझा जाता है. वहां की संस्कृति और माहौल और आजीविका के साधनों में बदलाव को देखा जाता है. कुल मिलाकर 10 साल में पहाड़ कितने बदले हैं, यह इस यात्रा में देखा जाता है.
अस्कोट-आराकोट अभियान के तहत 2024 की यात्रा में शामिल होने वाले विपिन लोकल 18 को बताते हैं कि साल 1974 में उत्तराखंड के एनसाइक्लोपीडिया कहे जाने वाले मशहूर इतिहासकार प्रोफेसर शेखर पाठक ने पहाड़ के जंगल, जमीन, जल और जनता का अवलोकन और उसपर अध्ययन करने के लिए अस्कोट-आराकोट अभियान की शुरुआत की थी, जिसमें साहित्यकार, कवि, लेखक, नेता और समाजसेवी जुड़े थे. प्रोफेसर शेखर पाठक ने पहाड़ नाम से संगठन बनाई. इसी से जुड़कर हिमालय के हिस्सों में यात्रा की जाती है.
यात्रा में शामिल 200 से ज्यादा लोग
विपिन बताते हैं कि उनके साथ 45 दिन की इस यात्रा में 200 से भी ज्यादा लोग शामिल थे, जो अलग-अलग क्षेत्रों में जाते थे. हमने इस यात्रा में कई चीजें देखीं. हमने देखा कि सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के साधन आज भी पहाड़ के कुछ गांवों से बहुत दूर हैं. पहाड़ में खेती सिमटती जा रही है लेकिन बागवानी, कुछ उत्पादों का उत्पादन काफी बढ़ा है. कीड़ाजड़ी, लाल चावल, राजमा, मंडुआ और कीवी आदि काफी जगह काफी संख्या में उत्पादित किया जा रहा है. कई लोगों ने अपने पुराने घरों को होमस्टे के रूप में बना दिया है, तो वहीं कई ऐसे घर भी थे, जो दुरुस्त कर होमस्टे के रूप में तैयार किए सकते हैं लेकिन जर्जर हालत में पड़े हैं. वहीं जंगलों की आग, भूस्खलन आदि आपदाएं आज भी स्थानीय लोगों के लिए मुसीबत बनती हैं. रोजगार की तलाश में अपने घरों को छोड़कर लोग शहरों का रुख कर चुके हैं. खाली पड़े गांवों के कई घरों में ताला जड़ा हुआ है.
पहाड़ों में प्लास्टिक का अम्बार
उन्होंने कहा कि कई जगहों पर रिवर्स पलायन की सुखद तस्वीरें भी नजर आईं. आज के प्रौद्योगिकी क्रांति वाले इस युग में बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना बहुत जरूरी है लेकिन कनार विलेज जैसे पहाड़ के कई ऐसे गांव हैं, जहां बच्चों के स्कूल घरों से मीलों दूर हैं. जहां बरसात के दिनों में जाते हुए कई बार बच्चों और अभिभावकों को परेशानी होती है. दूरी ज्यादा होने के चलते कई बच्चे पांचवीं-आठवीं तक ही पढ़ पाते हैं. वहीं पाणा गांव जैसे कुछ इलाके भी देखे गए जहां मोहन सक्सेना और उनके सहयोगियों ने जूनियर हाईस्कूल को कई प्रजातियों की खूबसूरत गुलाबों से सजाया है और बच्चों के मन भी शिक्षा से यहां महकते नजर आए. देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों में प्लास्टिक और कूड़े कचरे का अम्बार लगा हुआ नजर आया, तो इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि नदियों को मैला कर प्रदूषण फैलाने में पिछले एक दशक में इंसान ने कोई कमी नहीं छोड़ी है. आज भी कई गांव ऐसे हैं, जहां अगर महिला का प्रसव होने वाला होता है, तो उसे एक महीना पहले ही अस्पताल के पास किसी स्थान पर ठहराया जाता है क्योंकि उनके घर तक सड़क नहीं जाती है. कई जगह चारपाई पर उन्हें ले जाया जाता है.
शांत इलाकों में भी शांति भंग कर रही आधुनिकता
विपिन ने बताया कि चारधाम यात्रा चल रही है. ऐसे में हेली सेवा देने वाली 12 कम्पनियों के हेलीकॉप्टर हर 15-20 मिनट में पहाड़ के कुछ गांवों से होकर गुजरते हैं. सुबह 4-5 बजे से यह शुरू हो जाते हैं. इनकी आवाजें स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई में तो व्यवधान तो डालती ही हैं, इसके साथ ही यह एक लंबे समय बाद यहां के स्थानीय लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालने वाली हैं. कर्जन गांव का सुदर गांव झांझी आज भी मोबाइल नेटवर्क से वंचित है. रैणी गांव एक ढालदार चट्टान पर अटका है, जहां अक्सर भूस्खलन का खतरा रहता है. स्थानीय बताते हैं कि बरसात के दिनों में रातभर उन्हें जागना पड़ता है और खौफ के साये में बरसात का मौसम कटता है. अपना घर छोड़कर उन्हें स्कूलों में जाकर रहना पड़ता है. विपिन ने बताया कि उनकी पहली यात्रा थी. वह जितने इस यात्रा में शामिल होने से पहले उत्सुक थे, इसे पूरा करने के बाद उन्होंने मानो पूरा उत्तराखंड घूम लिया हो.
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FIRST PUBLISHED : July 15, 2024, 12:23 IST