OPINION: महज पत्थरों का ढेर नहीं, जोशीमठ हूं मैं; मुझसे ही होकर जाता है स्वर्ग का रास्ता


‘यूं ही मैं जोशीमठ नही बना हूं…,’ यहां तक पहुंचने की मेरी एक लम्बी यात्रा है. एक ऐसी यात्रा जो कुछ महीनों या सालों की न होकर, कई सदियों की है. इस यात्रा में मैंने कई बदलावों को देखा. लेकिन, जैसा बदलाव आजकल मैं देख रहा हूं, उसकी कल्पना तो शायद ही किसी ने की होगी. जो हश्र मेरा होने जा रहा है, उसकी भविष्यवाणी तो आदिगुरू शंकराचार्य भी नहीं कर पाए थे. फिर क्यों मेरा आंगन छलनी-छलनी हुए जा रहा है? क्यों हर पल मेरी छाती फट रही है? और दरकते मेरे आंगन की दरारों में जैसे सबकुछ जमींदोंज होने को है.

लगातार बढ़ती इन्हीं दरारों के बीच न चाहते हुए भी मैं अपने बनने के दौर में पहुंच गया हूं. इतिहास के पन्नों में जाकर खुद को देख रहा हूं, तो पाता हूं कि मैं सिर्फ जोशीमठ ही नही हूं, बल्कि एक सभ्यता का प्रतीक हूं, सनातन धर्म का ध्वजवाहक हूं. सदियों का सुनहरा इतिहास छिपा है मेरे गर्भ में. वैसे तो मैं अनंतकाल से हूं, लेकिन मेरी धरा को पहचान दिलाई, आदिगुरू शंकराचार्य ने. कुछ तो खास था मुझमें जो ज्ञान हासिल करने के लिए 8वीं सदी में मेरी धरती पर आए आदिगुरू. मेरी धरती से ही तो शुरू हुआ था, सनातनी मठों के बनने का सफर. मेरे आंगन से ही गुजरता है बद्रीनाथ धाम का रास्ता. पूरे देश के सनातनी भगवान ब्रदीविशाल के दर्शनों से पहले आज भी मेरे घर में ही गुजारते हैं रात. सर्दियों के 6 महीने बद्रीनाथ की गद्दी मेरी माटी में बने नरसिंह मंदिर में रहती है. नरसिंह मंदिर जितना सुंदर है, उनता ही प्राचीन भी है. साल भर ऐतिहासिक नरसिंह मंदिर में जनसैलाब रहता है. ऐसा लगता है जैसे हर वक्त यहां त्यौहार का जश्न हो रहा हो.

अलकनंदा और धौलीगंगा जैसी जीवनदायिनी नदियों के बीच मैं जोशीमठ कत्यूरी शासकों की प्रिय स्थली रहा. पहाड़ के इन शूरवीरों ने पूरी 4 सदियों तक मुझे अपनी राजधानी बनाया. कत्यूरी राजाओं ने तो कार्तिकेयपुर नाम से भी मुझे नवाजा. आदि गुरू शंकराचार्य के आने के साथ मेरा सफर भले ही ज्योतिर्मठ नाम से शुरू हुआ हो, लेकिन फिर मैं कार्तिकेयपुर और आज जोशीमठ बना हूं. सनातनी धर्म का ध्वज वाहक तो मैं रहा ही हूं. यही नहीं, मेरे आंगन से ही सिखों के दसवें गुरू गोविंद सिंह भी गुजरे थे हेमकुंडसाहिब के लिए. सिखों की पवित्र स्थली का रास्ता भी मुझे छूकर ही गुजरता है. हर साल लाखों सिख धर्म के अनुयायी भी आते हैं मेरे आंगन में.

आपके शहर से (देहरादून)

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‘यूं ही नही बना मैं जोशीमठ…’ चीन बॉर्डर पर बसे नीतिमाणा जाने का सफर भी मेरे आगंन से ही शुरू होता है. 1962 के चीनी हमले में भी मेरी धरती पर देश के योद्धा ठहरे थे. दुश्मनों को करारा जवाब देने के लिए यहीं भारतीय सेना ने अपना कैंप भी बनाया है. यही नहीं, देश की सुरक्षा के लिए हेलीपैड भी बना है. चीन के बॉर्डर को जोड़ने वाली कई सड़कें यहीं से कटी हैं. इन्हीं सड़कों के जरिए जाबांज पहुंचते हैं हजारों फीट की ऊंचाई पर देश की सुरक्षा के लिए.

एशिया की सबसे बड़ी फूलों की घाटी भी तो है मेरे पड़ोस में, वहां जाने के लिए भी मेरा स्पर्श जरूरी है. दुनिया भर के लाखों लोग आते हैं रंग-बिरंगे ऐसे फूलों को निहारने जो कहीं और नजर नही आते हैं. बर्फ की सफेद चादर में लिपटा औली मेरी दुनिया में चार चांद लगाता है. श्रृद्धालुओं की आस्था का द्वार होने के साथ ही मैं देश-दुनिया के सैलानियों की पहली पसंद भी हूं. देश की सुरक्षा का केन्द्र बिंदू भी मैं ही हूं. कई पीढ़ियों को जन्म लेने के साथ ही दुनिया को अलविदा कहते देखा है मैंने. आदिकाल के जंगल युग से आधुनिकता का सफर तय किया है मैंने. एक दौर था जब मैं यहां अकेला था, लेकिन वक्त के साथ काफिला बढ़ता गया. ये काफिला इतनी तेजी से बढ़ा कि मेरी कमर ही टूटने लगी. मेरे अपनों ने भी कोई कसर नही छोड़ी मुझे खोखला बनाने में.

आधुनिकता की चकाचौंध में बना डालीं मेरे ऊपर हजारों गगनचुंबी इमारतें. अब तो लगता जैसे मेरी खासियतें ही मेरी बर्बादी की वजह बन गईं. मेरी क्षमता से कई गुना ज्यादा बोझ डाला गया मेरे सिर पर. मेरे सीने को चीरते हुई कई टनल निकली हैं. पहाड़ में ट्रेन पहुंचाने को लालायित लोगों ने मेरे अस्तित्व पर खतरा पैदा कर डाला. अनगिनत ब्लास्ट के धमाकों को सालों से सहता आया. दशकों से जो दर्द मेरे भीतर है उसकी परवाह किसी ने नहीं की. लोग भूल गए मैं हूं तो बहुत कुछ है यहां, मेरे नहीं होने पर होगा तो सिर्फ शून्य. लेकिन अब टूट रहा हूं, बिखर रहा हूं, दरक रहा हूं. मुझे बचाने की कुछ कोशिशें अंतिम वक्त में होती दिख रहीं हैं. लेकिन ये सभी कोशिशें बेकार हैं. क्योंकि, मैं अंतिम सांसे ले रहा हूं, हर तरफ से खंडित होने के बाद मेरी याद अब लोगों को आ रही है.

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