Public Opinion : 5 साल में 40 प्रतिशत बढ़ गई फीस… स्कूल को बना दिया मॉल? कैसे होगी बच्चों की पढ़ाई?


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Public Opinion: पिछले पांच सालों में स्कूल फीस में 40% की बढ़ोतरी और किताबों की कीमतों में वृद्धि से अभिभावक चिंतित हैं. माता-पिता का कहना है कि स्कूल प्रबंधन किताबें स्कूल से ही खरीदने का दबाव डालता है. सरकार …और पढ़ें

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बढ़ती स्कूल फीस और किताबों के दाम पर लोगों की राय

हाइलाइट्स

  • स्कूल फीस में 5 साल में 40% बढ़ोतरी हुई है.
  • किताबों की कीमतें भी 5% तक बढ़ी हैं.
  • अभिभावक शिक्षा खर्च से परेशान हैं.

देहरादून : एक बार फिर नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है. 1 अप्रैल से स्कूलों में नया सत्र शुरू होने जा रहा है और बाजारों में NCERT के साथ-साथ निजी प्रकाशकों की किताबों की बिक्री तेज हो गई है. लेकिन इस बार किताबों की कीमतें पिछले साल के मुकाबले और महंगी हो गई हैं, जिससे माता-पिता की जेब पर सीधा असर पड़ा है. किताब विक्रेताओं के मुताबिक, निजी प्रकाशकों की किताबों के दाम इस बार करीब 5% तक बढ़ा दिए गए हैं. बीते साल जिन किताबों का सेट 3600 रुपए में मिल रहा था, वही सेट अब 3900 रुपए तक पहुंच गया है. बाजार में कॉपी-किताबों के साथ स्टेशनरी की कीमतें भी बढ़ चुकी हैं, जिससे अभिभावकों का बजट गड़बड़ा गया है.

लोकल18 से बातचीत में ज्योति सेमवाल नाम की अभिभावक ने कहा, हर साल यही होता है. स्कूल फीस बढ़ा देते हैं और बाजार में किताबों के दाम भी आसमान छूने लगते हैं. अब तो कई किताबों के दाम दोगुने हो चुके हैं. समझ नहीं आता कि बच्चों की पढ़ाई कैसे जारी रखें. वहीं, अभिभावक नीतू ने बताया, आमदनी वही है लेकिन खर्चे हर साल बढ़ रहे हैं. स्कूल कभी कंप्यूटर फीस तो कभी फंक्शन फीस के नाम पर जेब ढीली करवा रहे हैं. किताबों की बढ़ती कीमतों के साथ इन अतिरिक्त शुल्कों ने परेशान कर रखा है. सरकार को इस पर सख्ती से ध्यान देना चाहिए.

5 साल में 40 प्रतिशत बढ़ गई स्कूल फीस
अभिभावक मिनाक्षी नेगी ने कहा, पिछले पांच सालों में स्कूल फीस में लगभग 40% की बढ़ोतरी हुई है. अब किताबों के दाम भी उसी राह पर हैं. स्कूलों में फीस बढ़ोतरी को लेकर बवाल होते रहते हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. मोनिका ने बताया कि उनके बच्चे की नर्सरी में फीस 3000 रुपए थी, जो अब दूसरी कक्षा में पहुंचते-पहुंचते दोगुनी हो गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि स्कूल प्रबंधन कई बार अभिभावकों पर किताबें स्कूल से ही खरीदने का दबाव बनाते हैं. अभिभावकों का कहना है कि हर साल यह मुद्दा उठता है लेकिन कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता. सरकार अगर समय रहते हस्तक्षेप न करे, तो शिक्षा खर्च आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जाएगा.

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