कुमाऊं की मिट्टी में आज भी बसता है एक अंग्रेज का नाम,जिसे लोग कहते हैं ‘रामजी'


नैनीताल: उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का इतिहास अगर सुनहरा है, तो उसका एक बड़ा श्रेय उस ब्रिटिश अधिकारी को जाता है, जिसे यहां के लोग प्यार से। “रामजी” कहते थे. उनकी दरियादिली के चलते लोग उन्हें भगवान राम का रूप मानने लगे थे. उनका नाम था सर हेनरी रैमसे (Kumaon Commissioner Henry Ramsay) जो 1856 से 1884 तक कुमाऊं के कमिश्नर रहे. उन्होंने सिर्फ एक अफसर के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सेवक, मार्गदर्शक और सच्चे शुभचिंतक के रूप में लोगों का दिल जीता.

हेनरी रैमसे का जन्म 1816 में स्कॉटलैंड के एक सम्मानित परिवार में हुआ था. उनके पूर्वजों ने वाटरलू की लड़ाई में हिस्सा लिया था. रैमसे ने अपने करियर की शुरुआत सेना से की थी. उनकी पहली पोस्टिंग मद्रास में हुई, लेकिन बाद में कुमाऊं के उस समय के कमिश्नर जी डब्ल्यू ट्रेल से प्रभावित होकर उन्होंने प्रशासनिक सेवा जॉइन कर ली. 1840 में वे जूनियर असिस्टेंट कमिश्नर बने और 1845 में गढ़वाल में सीनियर असिस्टेंट कमिश्नर का पद संभाला. फिर 1856 में वे कुमाऊं के कमिश्नर बने और यहीं से शुरू हुआ एक यादगार और इंसानियत से भरा नेतृत्व का दौर.

जब ‘व्हाइट साधु’ बना ‘रामजी’
कुमाऊं के लोगों ने रैमसे को सिर्फ एक अफसर नहीं, बल्कि भगवान राम का रूप माना. उन्हें “रामजी” कहकर बुलाया जाने लगा. इतिहासकार प्रो. अजय रावत बताते हैं कि रैमसे को कुमाऊंनी, गढ़वाली और नेपाली जैसी स्थानीय भाषाओं की अच्छी समझ थी और वे ग्रामीणों से उन्हीं की भाषा में बात करते थे. वे गांव-गांव जाकर लोगों के बीच बैठते, उनकी परेशानियां सुनते और तुरंत हल भी निकालते थे. इसी वजह से लोग उन्हें ‘बूबू’, ‘चाचा’, ‘ताऊ’ और फिर ‘रामजी’ कहने लगे. रैमसे गांवों में लोगों के घर जाकर ही दरबार लगाते थे और वहीं जन समस्याएं सुनकर उनका हल निकालते थे. वे हमेशा गरीबों की मदद करते थे.

समाज सुधार की दिशा में अहम कदम
उस दौर में जब कुष्ठ रोगियों को समाज से अलग कर दिया जाता था, रैमसे ने अल्मोड़ा में कुष्ठ आश्रम शुरू कर एक बड़ा सामाजिक बदलाव किया. उन्होंने पारंपरिक खेती, बागवानी और चाय की खेती को बढ़ावा दिया. रामगढ़, मुक्तेश्वर और बेरीनाग में सेब और चाय की खेती को देश और दुनिया में पहचान दिलाने में उनका बड़ा योगदान रहा. नैनीताल के आलू, जो कभी कलकत्ता तक मशहूर थे, उन्हीं की प्रेरणा से रामगढ़, खुर्पाताल और मुक्तेश्वर में बड़े स्तर पर उगाए जाने लगे. यहां के रेड डिलीशियस और गोल्डन डिलीशियस सेब को उन्होंने देश और विदेशों तक पहचान दिलाई.

शिक्षा और संस्कृति में भी निभाई बड़ी भूमिका
शिक्षा के क्षेत्र में भी रैमसे का योगदान खास रहा. नैनीताल के जाने-माने सेंट मैरी कॉन्वेंट स्कूल के लिए उन्होंने कम कीमत पर बिल्डिंग दिलवाई. इसके अलावा भारत के पहले मैथोडिस्ट चर्च के लिए 7 एकड़ जमीन भी दान दी. रैमसे ने नैनीताल के व्यवस्थित विकास की नींव रखी स्कूल, अस्पताल, चर्च और सड़कों का निर्माण करवाकर इसे प्रशासन और समाज का अहम केंद्र बना दिया.

रिटायर होने के बाद भी बना रहा रिश्ता
1884 में रिटायर होने के बाद रैमसे काफी बुजुर्ग हो चुके थे और इंग्लैंड लौट गए, लेकिन उनका रिश्ता कुमाऊं से खत्म नहीं हुआ. इंग्लैंड से भी वे यहां के लोगों को चिट्ठियां भेजते और जरूरतमंदों की मदद करते रहते. आज भी नैनीताल में रैमसे अस्पताल, चर्च और स्कूल उनकी याद दिलाते हैं. उनके लिए लोगों की श्रद्धा इतनी गहरी है कि आज भी पहाड़ की जागरों (लोकगीतों) में रैमसे का नाम लिया जाता है और उन्हें “व्हाइट साधु” कहा जाता है.

वे एक ऐसे अफसर थे, जो लोगों के दिलों में बस गए. उनकी सोच, नीतियां और संवेदनशीलता आज भी कुमाऊं के लोगों को प्रेरणा देती हैं.