देहरादून: उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में वर्षों से पलायन और पुरुष-प्रधान राजनीति ने गांवों को खाली और व्यवस्था को कमजोर किया है. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. कॉलेज से निकलते ही गांव लौट रहीं Gen Z की पढ़ी-लिखी युवा महिलाएं पंचायत की कमान संभाल रही हैं. डिग्री, आत्मविश्वास और स्मार्टफोन से लैस ये नई प्रधान न सिर्फ पलायन को चुनौती दे रही हैं, बल्कि ‘प्रधान-पति’ राजनीति की जड़ें भी हिला रही हैं.
पंचायत चुनावों में दिखा पीढ़ीगत बदलाव
जुलाई के अंत में आए उत्तराखंड पंचायत चुनाव नतीजों में कई गांवों में युवा महिलाएं पहली बार प्रधान बनीं. परंपरागत रूप से बुजुर्ग पुरुषों के कब्जे वाली सीटों पर अब 20–22 साल की लड़कियां चुनी गई हैं. कुछ ही महीनों में ये युवा प्रधान पलायन, खराब सड़कें, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूल समस्याओं पर सीधे काम कर रही हैं.
साक्षी रावत: लैब की जगह गांव को चुना
पौड़ी गढ़वाल के कुई गांव की रहने वाली साक्षी रावत (22) ने बायोटेक्नोलॉजी की डिग्री पूरी करने के बाद देहरादून में नौकरी करने की बजाय गांव लौटने का फैसला किया. साक्षी कहती हैं, ‘ज्यादातर युवा पढ़ाई के बाद गांव छोड़ देते हैं. मैं चाहती हूं कि वे यहीं रहें और कुछ बनाएं.’ उनका मानना है कि असली बदलाव घर से शुरू होता है और उत्तराखंड का भविष्य युवाओं के हाथ में है.
प्रियंका नेगी: गणित से शासन तक
चमोली जिले के सरकोट गांव की प्रधान प्रियंका नेगी (21) कभी गणितज्ञ बनना चाहती थीं. उनके पिता खुद दो बार प्रधान रह चुके हैं. ब्लॉक बैठकों में साथ जाते हुए प्रियंका को समझ आया कि असल गणित शासन में है. उनकी प्राथमिकता है सड़क कनेक्टिविटी. प्रियंका मानती हैं कि सड़कें ठीक हों तो पहाड़ की आधी समस्याएं अपने आप सुलझ जाएंगी.
नेतृत्व और मातृत्व साथ-साथ: दीक्षा मंडोली
गुलाड़ी गांव (चमोली) की प्रधान दीक्षा मंडोली महज 22 साल की हैं. 20 की उम्र में शादी और 21 में मां बनने के बावजूद उन्होंने नेतृत्व संभाला. अंग्रेजी से स्नातक दीक्षा युवाओं में बढ़ती नशे की लत को बड़ी चुनौती मानती हैं. वह साफ कहती हैं, ‘अब लोग सीधे हमसे बात करते हैं, किसी ‘प्रधान-पति’ की जरूरत नहीं.’
छोटे गांव, बड़ी सोच: किरण नेगी
चमोली के चारी गांव (करीब 250 मतदाता) की प्रधान किरण नेगी अपने ब्लॉक की सबसे युवा प्रधान हैं. उनका कहना है, ‘गांव छोटा है, लेकिन समस्याएं बड़ी हैं पानी, सड़क, सब कुछ.’ किरण बिना किसी पुरुष प्रतिनिधि के फैसले ले रही हैं, जो यह साबित करता है कि नेतृत्व सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है.
पलायन और पितृसत्ता दोनों को चुनौती
ये Gen Z प्रधान मानती हैं कि उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या न तो पैसा है और न ही भूगोल, बल्कि सोच है. इनका लक्ष्य है-
गांव में रोजगार
बेहतर स्कूल
मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था
युवाओं को गांव में ही भविष्य दिखाना
