75 साल की उम्र में भी पेड़ों को जीवन दे रहें हैं देहरादून के ये पर्यावरण प्रेमी


देहरादून: जहां पूरी दुनिया 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day 2025) के रूप में मनाती है, लेकिन राजधानी देहरादून के बुजुर्ग पर्यावरण प्रेमी जगदीश बाबला हर दिन पर्यावरण दिवस मनाते है. पर्यावरण के क्षेत्र में उनके पिछले चार दशकों में दिए गए योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.

जगदीश बाबला ने साल 1979 से अब तक लाखों पेड़ लगाए हैं. वह सिर्फ पौधे नहीं लगाते, बल्कि उनकी देखभाल भी करते हैं. स्कूलों और कॉलेजों में जाकर बच्चों के साथ मिलकर वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाते हैं और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं. उनके इसी समर्पण के चलते उन्हें पर्यावरण पुरस्कार, गांधी पर्यावरण पुरस्कार, राष्ट्रीय युवा पुरस्कार जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं. वह पूर्व राष्ट्रपति के हाथों भी सम्मानित हो चुके हैं.

एक पिकनिक ने बदल दी सोच
जगदीश बाबला ने बताया कि 1979 में वह दोस्तों के साथ एक पिकनिक पर गए थे. वहां पेड़ की छांव ढूंढनी चाही लेकिन कोई पेड़ मिला ही नहीं. तभी उन्होंने निश्चय किया कि अगली बार जब भी पिकनिक पर जाएंगे, पेड़ जरूर लगाएंगे. उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर वृक्षारोपण की शुरुआत की. धीरे-धीरे कई युवा भी उनके साथ जुड़ते गए.

आज जब वह परेड ग्राउंड, हिंदी भवन और कचहरी जैसी जगहों पर खुद के लगाए पेड़ों को हरा-भरा देख लेते हैं, तो उन्हें बेहद संतोष होता है. वह कहते हैं कि लोग 5 जून को पौधे तो लगाते हैं, लेकिन बाद में उनकी देखभाल नहीं करते. सिर्फ पौधारोपण काफी नहीं है, पेड़ों को बचाना और बड़ा करना भी उतना ही जरूरी है. यही वजह है कि वह जून की बजाय जुलाई में पौधारोपण करते हैं, ताकि बारिश में पौधे आसानी से जड़ पकड़ सकें और बच सकें.

27,200 पौधों का अभियान
पर्यावरण को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए जगदीश बाबला ने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘हिमालय पर्यावरण सेवा संस्था’ बनाई. उनके इस अभियान से ओएनजीसी और अन्य विभागों के अधिकारी भी जुड़ते गए. जब वह टूर पर भी जाते, तो गाड़ियों में पौधे भरकर ले जाते थे और जहां जगह मिलती, वहीं रोप देते थे, ताकि लोगों को प्रेरणा मिल सके.

उन्होंने ब्लॉक प्रमुख हीरा सिंह बिष्ट से परेड ग्राउंड और पवेलियन ग्राउंड के बीच वृक्षारोपण की अनुमति मांगी, जो उन्हें नहीं मिल पाई. इसके बाद उन्होंने धोरन गांव में 27 एकड़ ज़मीन पर बड़ा वृक्षारोपण अभियान चलाया. इतने बड़े क्षेत्र में पौधारोपण के लिए उन्हें लोगों की मदद चाहिए थी, तो उन्होंने स्कूलों, कॉलेजों और समाज के अन्य हिस्सों से लोगों को जोड़ा. गांव के तत्कालीन प्रधान ललिता प्रसाद की मदद से शुरू हुए इस अभियान में डेढ़ महीने के अंदर 27,200 पौधे लगाए. यह किसी भी पर्यावरण प्रेमी के लिए मिसाल है.

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