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St Nicholas Church Nainital: नैनीताल की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच स्थित सेंट निकोलस चर्च सिर्फ एक धार्मिक भवन नहीं, बल्कि 19वीं शताब्दी की उस ऐतिहासिक कहानी का हिस्सा है, जिसने पहाड़ों में रहने वाले बच्चों, शिक्षकों और लोगों की सुरक्षा के लिए एक नया अध्याय लिखा. सेंटा क्लॉस के नाम पर बने इस चर्च की विरासत आज भी पहाड़ों की धुंध और शांति में अपनी सौ साल पुरानी कहानी सुनाती है.

नैनीताल: उत्तराखंड के नैनीताल की धुंध से ढकी शांत पहाड़ियों में बसे हर एक पगडंडी के पीछे एक कहानी छिपी है. कुछ प्रकृति की, कुछ इतिहास की और कुछ उन लोगों की जिन्होंने इन वादियों में अपनी विरासत छोड़ी. इन्हीं कहानियों में से एक है सेंट निकोलस चर्च (Christmas 2025), जिसकी ऐतिहासिक कहानी आज भी नैनीताल संजोए बैठा है. यह चर्च सिर्फ औपनिवेशिक स्थापत्य का प्रतीक नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के समय की ज़रूरत, संघर्ष और अद्भुत प्रेरणा की मिसाल है.

उत्तराखंड के नैनीताल निवासी प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत बताते हैं कि 19वीं शताब्दी में जब नैनीताल की बसावट बढ़ रही थी, तब शेरवुड कॉलेज और ऑल सेंट्स कॉलेज की स्थापना हो चुकी थी हो चुकी थी. इन दोनों स्कूल के छात्रों और शिक्षकों को हर रविवार सूखाताल स्थित सेंट जॉन्स चर्च में प्रार्थना के लिए जाना पड़ता था. लेकिन इस चर्च का रास्ता घने जंगलों के बीच से गुजरता थी, जहां जंगली जानवरों का हमेशा खतरा बना रहता था. उस समय पहाड़ों की यात्रा आसान नहीं होती थी. इस चुनौती से निपटने के लिए सन् 1890 में बिशप एल्फ्रेड ऐल्फील्ड क्लिफर्ड और उत्तर पश्चिमी प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर ऑकलैंड काल्विन ने राजभवन के निकट स्थित एक ऊंचे, सुरक्षित स्थान पर नए चर्च की नींव रखी. छह साल बाद, 1896 में, इस चर्च को औपचारिक रूप से प्रतिस्थापित किया गया. आज भी सर ऑकलैंड काल्विन का नाम लखनऊ के प्रतिष्ठित काल्विन कॉलेज से जुड़ा है. यह कुमाऊं का पहला सेंट निकोलस चर्च बना.

सेंटा क्लॉस के नाम पर है चर्च का नाम
इस चर्च की पहचान सिर्फ इसके स्थान और स्थापत्य तक सीमित नहीं है, इसका नाम अपने आप में एक दंतकथा है.  प्रो. अजय रावत बताते हैं कि चर्च का नाम सेंट निकोलस के सम्मान में रखा गया, जिन्हें पूरी दुनिया में फादर क्रिसमस या सेंटा क्लॉस के रूप में जाना जाता है. यूनानी मूल के यह संत परोपकार और चमत्कारिक कार्यों के लिए प्रसिद्ध थे. उनका सबसे चर्चित चमत्कार समुद्र में फंसे नाविकों को चमत्कारिक रूप से बचाने का माना जाता है. इसी कारण वे नाविकों के संरक्षक संत कहलाए. उनका जन्म 15 मार्च 270 ईस्वी को पतारा नामक स्थान में हुआ और 6 दिसंबर 343 ईस्वी को मायरा में देहांत हुआ. उनके जन्म और निधन की तिथियां आज भी ईसाई संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं.
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नैनीताल का हैरिटेज चर्च
दुनिया भर में क्रिसमस पर उपहार देने की परंपरा भी सेंट निकोलस की उदारता से प्रेरित मानी जाती है. वे सिर्फ नाविकों ही नहीं, बल्कि व्यापारियों, तीरंदाजों, छात्रों और अविवाहित लोगों के भी रक्षक माने जाते हैं. रूस, सर्बिया और यूनान उन्हें अपने संरक्षक संत के रूप में पूजते हैं. उनकी लोकप्रियता इतनी अधिक रही कि उनकी मृत्यु के लगभग 200 वर्ष बाद मायरा में पहला सेंट निकोलस चर्च बनाया गया. उनके चित्रों, मूर्तियों और कथाओं ने सदियों से कला और संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान बनाए रखा है.

नैनीताल का सेंट निकोलस चर्च आज हैरिटेज भवन घोषित है. राजभवन के पास शांत जंगलों के बीच बसा यह चर्च न सिर्फ ईश्वर-भक्ति का स्थान है, बल्कि सौ साल से अधिक पुरानी उस कहानी का जीवंत प्रमाण भी है, जिसने पहाड़ के बच्चों को सुरक्षा दी और नैनीताल को भी ‘सेंटा क्लॉस’ की अमर कथा से जोड़ दिया.

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Seema Nath

सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. मैने शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 ( नेटवर्क 18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News 18 (नेटवर्क 18) के साथ जुड़ी हूं…और पढ़ें

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जंगलों के बीच सेंटा क्लॉस से जुड़ी विरासत! जानिए सेंट निकोलस चर्च की कहानी

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