देहरादून. उत्तराखंड के हरे-भरे पेड़-पौधे और हसीन वादियां बॉलीवुड और हॉलीवुड निर्माताओं को भी खींच लाती है, लेकिन यहां की स्थानीय फिल्में आज भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. बेहतरीन कहानी, पहाड़ का दर्द बयां करती गढ़वाली फिल्मों के प्लाट, लोकेशन और कलाकारों की मेहनत अन्य फिल्मकारों की तरह ही होती हैं.
जटिल भोगौलिक स्थिति और सीमित संसाधनों के बावजूद फिल्म निर्माता और निर्देशक गढ़वाली फिल्में बनाते हैं और कुछ ही जगह पर पर्दे पर फिल्में रिलीज हो पाती हैं. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जितनी मेहनत गढ़वाली फिल्मों को बनाने के लिए लगती है, उतना सफल यह नहीं हो पाती है.
उत्तराखंड में लंबे समय से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाली गढ़वाली फिल्मों पर चर्चा करते हुए News18 Local को उत्तराखंड की गढ़वाली फिल्मों की पहली महिला निदेशक और स्क्रीनप्ले राइटर सुशीला रावत ने बताया कि कितनी मेहनत से गढ़वाली फिल्मों का फिल्मांकन किया जाता है और उम्मीद की जाती है कि जो पहाड़ का दर्द और संस्कृति फिल्मों में दिखाने की कोशिश की है, वह पहाड़ से दूर बैठे लोग भी देख पाएं.
सुशीला रावत ने कहा कि आज शादी-विवाह जैसे समारोह में भले गढ़वाली फिल्मों के गाने कामयाब हो जाते हैं लेकिन युवाओं में अपनी स्थानीय गढ़वाली फिल्मों को देखने की बिल्कुल रुचि नहीं है, जो स्थानीय फिल्मों के आगे बढ़ने में बाधा बने हैं.
उन्होंने बताया कि गढ़वाली फिल्मों के ज्यादा सफल न होने का कारण यह भी है कि अभी तक ये फिल्में भावनाओं के दृष्टिकोण पर आधारित थीं, लेकिन अब मार्केट की डिमांड, युवाओं के रुझान को ध्यान रखा जाने लगा है.
गढ़वाली फिल्मों की पहली महिला डायरेक्टर सुशीला रावत के मुताबिक, गढ़वाली फिल्म के उत्थान के लिए सरकार को चाहिए कि स्कूलों व अन्य संस्थाओं में गढ़वाली भाषा पर ध्यान दे. जब बचपन से ही बच्चे अपनी भाषा के साथ आत्मीयता महसूस करेंगे तो जाहिर है इसका लाभ फिल्मों को भी मिलेगा. इसी के साथ ही जरूरी है कि स्थानीय भाषाओं पर काम करनेवाले लोगों को ज्यादा सब्सिडी दी जाए.
उन्होंने बताया कि पहाड़ों पर फिल्में बनाई जाती है लेकिन पहाड़ों पर फिल्में देखने के लिए सिनेमाघरों की कमी है. उनका कहना है कि मणिपुर और असम की तरह सौ-सौ लोगों की क्षमता के थियेटर बनाए जाए क्योंकि कोई भी व्यक्ति 50 किमी दूर अपना काम छोड़कर नहीं जाएगा.
सुशीला रावत का कहना है कि धीरे-धीरे तमाम व्यवस्था दुरुस्त करने की कोशिश की जा रही है पहले ऐसा होता था कि शूटिंग के लिए पहाड़ों पर इक्विपमेंट्स ले जाना मुश्किल होता था. अब सड़क के पास ही लोकेशन देखने की कोशिश की जाती है ताकि सामान आसानी से चढ़ाया जा सके.
बता दें कि सुशीला रावत गढ़वाली भाषा की पहली महिला निर्देशक हैं, जो गढ़वाली फिल्मों में एक्टिंग के साथ-साथ फिल्मों की कहानियां भी लिखती हैं. सुशीला रावत का जन्म 12 दिसंबर 1949 को पौड़ी गढ़वाल के गंगासालन में हुआ था. सुशीला बचपन से ही रंगमंच से जुड़ी रहीं. उन्होंने अर्धग्रामेश्वर, कंसानुक्रम, जय भारत जय जवान गढ़वाली नाटकों में अहम भूमिका निभाई है. इसके बाद उन्होंने फिल्मों की कहानी, पटकथा लिखने के अलावा निर्देशन में भी हाथ आजमाया है.
