गौरतलब है कि पिछले साल आपदाग्रस्त गांव चुकूम और सुंदरखाल के विस्थापन की कवायद भी शुरू हुई थी. प्रशासन स्तर पर दोनों गांवों में डोर-टू-डोर सर्वे भी किया गया था. सूत्रों के अनुसार ग्रामीणों को आमपोखरा रेंज की वन भूमि में विस्थापित किए जाने प्लान भी बनाया गया था लेकिन वन विभाग की आपसी खींचतान और कुछ तकनीकी आपत्तियों के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई. इसके बाद प्रशासन ने ग्रामीणों को उधमसिंहनगर जिले के जसपुर के किलावली क्षेत्र में बसाने का प्रस्ताव दिया, जिसे ग्रामीणों ने सिरे से खारिज कर दिया था.
जेल बन जाता है चुकुम गांव
प्रत्येक साल मानसून के दौरान कोसी का जलस्तर इतना बढ़ जाता है कि गांव पूरी तरह से ब्लॉक, तहसील और जिला मुख्यालय से कट जाता है. साल 2021 में हालात इतने बिगड़े कि हेलीकॉप्टर से राशन लोगों तक पहुंचाना पड़ा था. ग्रामीण कहते हैं कि बरसात का मौसम हमारे लिए जेल जैसा हो जाता है. न हम बाहर जा सकते हैं, न कोई अंदर आ सकता है.
ग्रामीणों का कहना है कि साल 1993 से विस्थापन की मांग जारी है. साल 2016 में एक सर्वे हुआ, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई, जसपुर के केलाखेड़ा में पहले जमीन चिन्हित की गई थी, लेकिन ग्रामीणों ने असहमति जताई. अब रामनगर के आमपोखरा रेंज के पास नई जगह पर कार्यवाही चल रही है, पर प्रक्रिया अधर में है.
दो ऑप्शन पर होगा विचार
एसडीएम प्रमोद कुमार के मुताबिक, नई भूमि चिन्हित कर ली गई है और ग्रामीणों की सहमति के बाद विस्थापन किया जाएगा. एक वैकल्पिक रास्ता (कुनखेत से चुकुम) जंगलों से होकर गुजरता है, लेकिन बरसात में वह भी दलदली और असुरक्षित हो जाता है. वहीं इस मामले पर नैनीताल की डीएम वंदना सिंह का कहना है कि दो विकल्प ग्रामीणों को दिए जाएंगे और उनकी सहमति के अनुसार आगे की प्रक्रिया होगी.
क्या 2025 में मिलेगा समाधान?
चुकुम गांव एक चेतावनी है उस व्यवस्था के लिए जो कागजों पर संवेदनशील है लेकिन ज़मीनी हकीकत में बहरी है. अगर इस बार भी विस्थापन सिर्फ बैठक और घोषणा तक सिमटा, तो अगली बरसात किसी मासूम के लिए आखिरी साबित हो सकती है.
