Uttarakhand Politics: ‘फिलहाल मैं पार्टी का हिस्सा नहीं’ हरीश धामी के बयान से कांग्रेस में फिर खलबली


पिथौरागढ़. उत्तराखंड में कांग्रेस हाईकमान भले ही पार्टी में सब कुछ ठीक होने का दावा कर रहा हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे जुदा है. धारचूला विधानसभा से लगातार तीसरी बार विधायक बने हरीश धामी ने साफ कह दिया है कि वह फिलहाल कांग्रेस का हिस्सा नही हैं. अभी आधिकारिक तौर पर यह साफ नहीं है कि उनकी आगे की रणनीति क्या होने वाली है. हालांकि प्रीतम सिंह की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद धामी का इस तरह का बयान सामने आना कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किल ही दिख रहा है.

हरीश धामी ने कहा कि वह अपने पुराने स्टैंड पर अब भी कायम हैं. कांग्रेस में उनकी उपेक्षा हुई है इसलिए फिलहाल वह खुद को कांग्रेस से अलग मानते हैं. सीनियर विधायक धामी ने विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद नेता प्रतिपक्ष पद के लिए दावेदारी की थी, लेकिन हाईकमान ने बीजेपी से कांग्रेस में शामिल हुए यशपाल आर्या को यह ज़िम्मेदारी दी. यही नहीं, धामी ने मुख्यमंत्री पुष्कर धामी के लिए भी सीट छोड़ने का ऐलान किया था, लेकिन सीएम ने धारचूला के बजाय चंपावत सीट को चुना.

इधर, भाजपा में यह घटनाक्रम हुआ, तो कांग्रेस में यशपाल आर्या के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष का पद करण माहरा को दिए जाने के बाद पार्टी के दिग्गज नेता प्रीतम सिंह भी नाराज़ दिखाई दिए थे. अपने गुट सहित उनके पार्टी से अलग होने की अटकलबाज़ी चल रही थी, जिस पर खुलकर विरोध जताकर प्रीतम सिंह ने साफ किया कि वह फिलहाल कांग्रेस के साथ ही हैं.

प्रीतम सिंह के बयान से मची हलचल
हरीश धामी के इस स्टैंड से एक रोज़ पहले ही पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह ने देहरादून में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा, ‘मैं भाजपा में जाऊंगा तो छुपकर नहीं जाऊंगा.’ हालांकि उन्होंने इन अटकलों पर ऐतराज़ जताते हुए कहा कि ऐसी खबरें छापने वाले समाचार समूहों के खिलाफ वह केस दर्ज करने वाले हैं. सिंह के इस तेवर के बाद उनके बीजेपी में जाने की अटकलों पर कुछ विराम लगा ही था कि अब धामी के तेवर कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी करते दिख रहे हैं.

धारचूला विधानसभा में गहरी हैं धामी के जड़ें
हरीश धामी धारचूला विधानसभा से 2012 में पहली बार विधायक बने थे. इसके बाद उन्होंने अपनी जड़ों को काफ़ी मज़बूत किया. यही वजह है कि लगातार तीन चुनाव वह जीत चुके हैं. धारचूला विधानसभा उत्तराखंड की उन विधानसभाओं में शामिल है, जहां राज्य बनने के बाद बीजेपी का कमल का फूल नहीं खिल पाया. 2002 और 2007 के चुनावों में इस सीट पर निर्दलीय का कब्ज़ा रहा था.

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