अरशद खान/ देहरादून: चंबा से सटे एक छोटे से गांव कूड़ी भैंस्यारों में अनिता बिष्ट नाम की अध्यापिका नज़ीर बनी हैं. उन्होंने दिल्ली से हाई स्कूल किया, फिर गांव में आकर 12 किलोमीटर दूर स्कूल पढ़ने के लिए गई और अपनी पढ़ाई पूरी की. बाद में b.ed भी किया. लेकिन इस दौरान अनीता बिष्ट को एक बात बहुत ज्यादा खलने लगी वह ये कि उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए कई किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है. इसलिए उन्होंने गांव में शहर जैसी शिक्षा देने की ठानी और गांव के बच्चों के लिए नर्सरी से आठवीं तक का स्कूल खोल दिया.
वह चाहती तो इस बात को नजरंदाज भी कर सकती थी और अपने करियर के लिए किसी बड़े शहर में अच्छी नौकरी कर लाखों रुपया भी कमातीं. लेकिन अनिता बिष्ट ने अपने करियर का त्याग किया और अपने गांव के आसपास बसे बच्चों का भविष्य संवारने की ठानी. लोकल 18 से बातचीत करते हुए वह बताती है कि उन्होंने यह प्रयास गांवों से होने वाले पलायन को रोकने के लिए किया है. बच्चों के भविष्य की चिंता और अच्छी शिक्षा की खोज पहाड़ के गांवों में बसने वाले परिवारों को शहर में ले जा रही थी. तब उन्होंने एक ऐसे स्कूल का सपना देखा जो गांव हो लेकिन वहां पर पढ़ाई और सुविधाएं शहर जैसी मिल सकें.
मामूली फीस में मिलती है अच्छी शिक्षा
वह बताती हैं कि उनके स्कूल के बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं, राज्य स्तर के खेलों में प्रतिभाग कर रहे हैं. बच्चों को कंप्यूटर क्लासेज दी जा रही है. अनीता बिष्ट ने आगे कहा कि अच्छी शिक्षा के लिए अच्छे टीचरों का होना भी जरूरी है इसलिए उन्होंने हाई-क्वालीफाई टीचरों को रखा है जो बच्चों का पर्सनेलिटी डेवलपमेंट भी कर रहे हैं. आज इन बच्चों की अंग्रेजी सुनकर कोई नहीं कह सकता कि यह एक गांव के स्कूल में पढ़ने वाले छात्र हैं. इन बच्चों को गांव में स्कूल खुलने से एक फायदा यह भी हुआ है कि यह सभी गरीब परिवारों के बच्चे हैं और शहर की पढ़ाई के खर्च का बोझ इनके परिजन नहीं उठा सकते हैं. इसलिए इन्हें मामूली फीस में अच्छी शिक्षा मिल रही है.
पिता से दान में मिली स्कूल के लिए जमीन
अनीता बिष्ट बताती है कि उनके इस प्रयास में उन्हें अपने माता-पिता का बहुत सहयोग मिला है. उनके पिता ने स्कूल के लिए जमीन दान दी और स्कूल वैन चलाकर बच्चों को लाने ले जाने का काम करते हैं. उनके पिता शिक्षा के प्रति हमेशा से जागरूक रहे हैं उन्होंने अपने सभी बच्चों को पढ़ा लिखाकर काबिल बनाया है. आज वह गर्व महसूस करते हैं कि शहरों में रहने के बावजूद भी उनके बच्चों ने पलायन नहीं किया और गांव में रहकर शिक्षा को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं.
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FIRST PUBLISHED : July 31, 2023, 18:00 IST
