ये कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की नहीं है, ये कहानी है जिद की, आत्मविश्वास की और उस जज्बे की, जो हमें इंसान बनाता है. अंकिता ने साबित कर दिया कि हाथों की नहीं, हिम्मत की जरूरत (Uttarakhand Inspirational Story) होती है किस्मत बदलने के लिए. रहने वाली अंकिता तोपाल (Daughter of Uttarakhand) का जन्म बिना दोनों हाथों के हुआ. लेकिन जहां ज़्यादातर लोग इसे अपनी कमजोरी बना लेते हैं
चमोली जिले के कर्णप्रयाग ब्लॉक स्थित डिडोली गांव की , वहीं अंकिता ने इसे अपनी ताकत बना लिया. उन्होंने अपने पैरों को कलम बनाया, कॉपी थामी और पढ़ाई के हर पड़ाव (Story of courage and determination) पर खुद को साबित किया. बचपन से ही बिना किसी विशेष सुविधा के, उन्होंने आम बच्चों की तरह स्कूल जाना शुरू किया. देवाल विकासखंड से 10वीं, ऋषिकेश से 12वीं और फिर देहरादून से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन कर उन्होंने खुद को तैयार किया, उस परीक्षा के लिए, जिसे देशभर के लाखों विद्यार्थी देने का सपना देखते हैं. दो साल की कड़ी मेहनत के बाद अंकिता ने ये मुकाम हासिल किया था.
JRF में हासिल की थी देशभर में दूसरी रैंक
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित JRF (जूनियर रिसर्च फेलोशिप) परीक्षा में अंकिता ने फरवरी 2025 ऑल इंडिया सेकंड रैंक हासिल कर ली. यह परीक्षा उन छात्रों के लिए होती है जो उच्चशिक्षा के क्षेत्र में रिसर्च करना चाहते हैं. इस रैंक के बाद अंकिता को न केवल पीएचडी में दाखिला मिलेगा, बल्कि भारत सरकार की ओर से उन्हें रिसर्च के लिए आर्थिक सहायता भी मिलेगी.
पैरों से ही लिख डाला था पेपर
अंकिता की कहानी न सिर्फ चमोली या उत्तराखंड की बेटियों के लिए, बल्कि पूरे देश की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा है. वह बताती हैं कि उनके लिए यह सफर आसान नहीं था. लेकिन मैं चाहती हूं कि कोई और बच्चा अगर ये कहानी पढ़े, तो उसे लगे कि अगर मैं कर सकती हूं, तो वह भी कर सकता है. लोगों को अपना आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए. कठिन परिस्थितियां सबके सामने आती है लेकिन जो उससे लड़ने की हिम्मत रखता है, वो ज़रूर सफलता हासिल करता है.
JRF यानी जूनियर रिसर्च फेलोशिप, एक राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा है, जिसे पास करने के बाद छात्रों को केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रिसर्च करने का मौका मिलता है. भारत सरकार उन्हें रिसर्च के लिए फेलोशिप भी देती है. यह परीक्षा साल में दो बार–जून और दिसंबर/जनवरी में होती है.
जब हिम्मत हो, तो कोई भी दिव्यांग नहीं होता
अंकिता तोपाल की यह कहानी (Motivational story in Hindi) सिर्फ परीक्षा पास करने की नहीं है. यह उस सोच को तोड़ती है जो दिव्यांगता को सीमा मानती है. उन्होंने साबित किया है कि अगर पैरों में हिम्मत हो, तो हाथों की कमी भी हार नहीं बनती. उनकी सफलता हमें सिखाती है कि हौंसला हो मजबूत तो हर मुसीबतें घुटने टेक देती है. हमारे आस-पास कई ऐसे उदाहरण है जो हमें भीतर से मजबूत बनाते हैं. अंकिता तोपाल की कहानी कुछ ऐसे ही प्रेरणादायक है. किस्मत को कोसने वालों को समझना चाहिए कि हम अपने भाग्य के खुद निर्माता होते हैं.
