उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री निशंक की किताब पर बनी फिल्म 'यु कनु रिस्ता' रिलीज, दिल छू लेगी मासूम की कहानी

देहरादून. उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार से वर्तमान सांसद डॉ रमेश पोखरियाल निशंक के उपन्यास पर बनी फिल्म ‘यु कनु रिस्ता’ थियेटर में रिलीज हो चुकी है. देहरादून के सिल्वर सिटी मॉल में इस फिल्म की पहली स्क्रीनिंग की गई.फिल्म निर्माता अंकित लक्की कंडियाल ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ निशंक के उपन्यास ‘छूट गया पड़ाव’ पर बनी यह फिल्म एक शिक्षिका द्वारा अपनी एक असाध्य रोग से पीड़ित छात्रा के इलाज के लिए संघर्ष और सीमा पर शहीद हुए परिवार की कहानी पर आधारित है. फिल्म में ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ के साथ-साथ भारतीय सेना में उत्तराखंड के वीर सपूतों की शहादत और उनके परिवार का जनहित भावना व देशप्रेम दिखाया गया है.

वहीं फिल्म में शिक्षिका के रूप में मुख्य रोल निभा रही अंकिता परिहार ने बताया कि एक कलाकार के लिए अपनी एक्टिंग के माध्यम से समाज में हो रही घटनाओं को और समाज की कहानियों को पर्दे पर उतारना बड़ी बात होती है. उन्होंने बताया कि जब उनके पास यह कहानी आई, तो उन्होंने कहानी पढ़ते ही उसे साइन कर दिया. थराली गांव में फिल्माई गई इस फिल्म में पहाड़ की संस्कृति, उत्तराखंड के ग्रामीण परिवेश के साथ-साथ जनकल्याण की भावना दिखाई गई है.

रुला देगी गढ़वाली फिल्म ‘यु कनु रिस्ता’ की कहानी
यह फिल्म उत्तराखंड के पहाड़ी गांव में बनी है, जिसमें कुछ सीन देहरादून के भी हैं. देहरादून की एक शिक्षिका का ट्रांसफर चमोली जनपद के थराली ब्लॉक में होता है, जहां वह गांव के बच्चों की शिक्षा पर जोर देती है. वहीं ब्लॉक प्रमुख की बेटी रानी होशियार होते हुए भी स्कूली शिक्षा से वंचित रहती है और वह खुद को अपने कमरे में बंद करके रखती है. इसकी वजह यह है कि वह एक गंभीर बीमारी से पीड़ित होती है, जिसमें उसके चेहरे और पर घने बाल होते हैं.उदास नन्हीं रानी अपने माँ बाप की दुलारी होते हुए अंधेरे कमरे में ही अपना जीवन काटती है.

मुख्य भूमिका निभा रही शिक्षिका सरोज रानी से मिलती है और उसे स्कूल जाने के लिए प्रेरित करती है. स्कूल में रानी के साथ वही होता है, जिसका रानी को डर होता है. कुछ बच्चे उसके रूप का मजाक उड़ाते हैं लेकिन कुछ उसका सपोर्ट भी करते हैं. रानी परीक्षा देती है, जिसमें वह अच्छा प्रदर्शन करती है. सरोज की मेहनत जैसे रंग सी लाती है.

सरोज को रानी से बहुत लगाव हो जाता है और वह उसका इलाज करवाने के लिए जानकारी जुटाती है. वह कई गैर सरकारी संस्था और सरकार के विभागों में चक्कर लगाती है ताकि रानी की होने वाली लाखों की सर्जरी में उसे आर्थिक सहायता मिल जाए लेकिन उसकी तमाम कोशिशें नाकाम रहती हैं. सरोज के साथ ही अन्य शिक्षिका के पति सेना में शहीद हो जाते हैं, जिनका मुआवजा उन्हें मिलता है तो वह रानी के हालात देखकर उसकी सर्जरी के लिए पैसे दे देते हैं.

सरोज बहुत खुश होती है और अगले ही दिन रानी और उसके पिता के साथ देहरादून के उस अस्पताल में आती है, जहां रानी का ऑपरेशन होता है. अब ऑपरेशन सफल होता है या इस भयानक बीमारी से रानी निजात नहीं पा सकती है, यह जानने के लिए आपको थिएटर में जाकर फिल्म देखनी होगी.

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