जयपुर लिट्रेचर फेस्टीवल का एक रंग यह भी

यह जयपुर लिट्रेचर फेस्टीवल की सुहानी शाम है और चारों तरफ अंधेरा दुनिया भर से आए लोगों को अपने आगोश में लेते हुए फैल रहा है। एक आवाज हलके वातावरण में तैर रही है, बॉदलेयर की एक कविता की पंक्ति है यह अंधेरा है, लेकिन देखो तो यह कितना दमकता हुआ खूबसूरत अंधेरा है।

जेएलएन मार्ग पर क्लार्क्स आमेर के इस परिसर में जेएलएफ का यह दूसरा दिन है, लेकिन इसमें गुलजार, मणिशंकर अय्यर, नमिता गोखले, गुरचरणदास, मृणाल पांडे, नवदीप सूरी या विलियम डेलरिंपल से आगे भी इतना कुछ है कि उसे सुनना और महसूस करना किसी बेहतरीन डुएट के आनंद से कम नहीं।

यहां कंधे से कंधे टकरा रहे हैं, कोई मुस्कुराकर निकल रहा है या किसी ने आपके कंधे पर हाथ रखकर महसूस किया तो आपको मालूम ही न हो कि ऊष्मा से भरा वह हाथ किसी विदेशी राजदूत का हो। कोई आपके सामने आए और हो सकता है कि वह इन सर्च ऑव मैरी : दॅ मदर ऑव ऑल जर्नीज जैसी बेहतरीन कृति देने वाली शख्सियत बी रॉलेट हो, जो दिल्ली-लंदन या यार्कशाइर में अक्सर रहते हुए अक्सर दॅ डेली टेलीग्राफ  के पन्नों पर दिख जाती हों। आप अगर गहरे में नहीं उतरे और मेला ही देखते रहे तो संभव है कि आप चूक जाएं कि यहां कोई बायोग्राफी ऑव दॅ अवर लेकर आया है और अब ऐसी लड़की की कहानी आपको बताने वाला है, जिसकी चोरी की लत ही नहीं छूट रही।

श्रीलंका और भारत में नॉर्वे की अंबेसडर एलिन स्टेनर कई कार्यक्रम सुन रही हैं और जैसे कोई दुर्लभ विदेशी पक्षी भारत की धरती पर गहरी घास में अपने लिए कोई मोती ढूंढ़ रहा है, वैसे ही वे एक-एक शब्द और ऐसा वाक्य तलाश रही हैं, जो झकझोर दे। मुगल टेंट में मैनी फेमिनिज़्म पर क्लेयर राइट, मार्टा ब्रीन और बी रॉलेट स्त्रियों के संसार की हकीकत और अफसानों का बयान कर कर रही हैं। मार्टा ब्रीन कहती हैं, ऑल्वेज वियर दॅ फेमिजिस्ट ग्लासेज! हमने इतना संघर्ष किया। यहां तक पहुंचीं और अभी हमें और दूर जाना है। बहुत कम स्थानीय लोग हैं, जो साहित्य की सबसे प्राचीन विधाओं में से एक यात्रा लेखन पर चल रहे विमर्श में दिलचस्पी ले हैं। संवाद बता रहा है कि यह अमूल्य थाती हमें सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है, जो व्यक्तिगत यात्राओं, विकास, स्थानों और लोगों के जटिल इतिहास और यहां तक कि मन की शक्ति और सीमाओं को दर्शाता है।

किसी को लग रहा है कि जयपुर साहित्य महोत्सव में पाठकों, लेखकों और पुस्तक प्रेमियों के लिए वही सब पुराना दिख रहा है, लेकिन आप इसकी परत उतारकर थोड़ा गहरे में उतरेंगे तो आपको दिल्ली से आए युवा अभिनव कृष्ण और मुकुल मिश्रा की तरह यह एक रूटीन लिट्रेरी इवेंट भर नहीं,  कुछ अलग लगेगा। जैसे आप कह सकते हैं मैग्नम ओपस मूवमेंट। शब्द को दोनों अर्थ में देखें। लम्हे की खूÞबसूरती भी और युवाओं के जीवन में उतरते साहित्य के एक आंदोलन के रूप में भी।

आप घूमते भी रहेंगे तो फिल स्कार्फ  और प्रियांक कृष्णा आपको एक ट्विस्ट के साथ नॉर्वेजियन जंगल जैसा कुछ एहसास कराएंगे। आपको दिल्ली विश्वविद्यालय के अंगरेजी विभाग के प्रमुख डॉ. अनिल तनेजा के शब्द भीतर तक झकझोर देंगे। वे कह रहे हैं, एक समय था जब दिव्य-दृष्टि के लिए न कोई स्कूल था और न कोई किताब। लेकिन आज यह प्रेरक कहानी की तरह है कि एक दिव्य-दृष्टि दुनिया के एक बेहतरीन विश्वविद्यालय का विभागाध्यक्ष है। एक घर में छह महिलाओं के साथ रह रहा और अपने आपको बहुत डरा हुआ महसूस कर रहा एक आदमी आपको अपने कोविड के दिनों के अनुभव सुना रहा है और बता रहा है कि कैसे उन महिलाओं ने उसे एक बेहतरीन लेखक बना दिया।
और यह क्या किसी छूटे हुए प्रेमी के अचानक टकरा जाने से कम है कि आपको एके रामानुजन की कविताएं भी सुनने को मिलें और फिर वहां वे डिस्कशन चलें, जो उनके निबंध की यादें ताजा कर देते हैं।

-त्रिभुवन

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