पहाड़ की अनोखी घास जो है औषधीय गुणों से भरपूर, मगर मारती है बिच्छू की तरह डंक, जानें डिटेल्स


रिपोर्ट : सीमा नाथ

नैनीताल. उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में कई ऐसे पेड़-पौधे पाए जाते हैं, जो औषधीय गुणों से भरपूर हैं. ऐसी ही एक घास पहाड़ी इलाकों में पाई जाती है, जिसे छूने से लोग डरते हैं, लेकिन यह औषधीय गुणों से भरपूर है. इसे बिच्छू घास, कंडाली या फिर सिसौंण (Nettle Leaf) भी कहा जाता है. गढ़वाल में इसे कंडाली और कुमाऊं में इसे सिसौंण कहा जाता है. साथ ही इसे एक प्राकृतिक मल्टी विटामिन के रूप में भी जाना जाता है.

800 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर मिलने वाली यह घास डंक मारने के लिए जानी जाती है. बिच्छू घास मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है. उत्तराखंड के नैनीताल में पाई जाने वाली इस घास का बॉटनिकल नाम अर्टिका पर्वीफ्लोरा हैं, जो अर्टिकेसी परिवार की सदस्य है. इस पौधे की पत्तियों और तने में छोटे छोटे सुई जैसे कांटे होते हैं, जो चुभने पर बिच्छू के डंक की तरह महसूस होते हैं, इसलिए इसे बिच्छू घास कहा जाता है.

वहीं पुराने जमाने में जब बच्चे स्कूल जाने में आनाकानी करते थे या पढ़ाई में ध्यान नहीं लगाते थे, तो माता-पिता उन्हें डराने के लिए बिच्छू घास का ही इस्तेमाल करते थे. उस समय के लोगों में बिच्छू घास का खौफ इस कदर था कि इसका नाम सुनते ही वे सहम जाते थे.

कुमाऊं विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ ललित तिवारी बताते हैं कि बिच्छू घास औषधि के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है. यह हृदय रोग, दमा, एलर्जी, जोड़ों के दर्द व त्वचा के रोगों के साथ ही अन्य औषधीय पौधों के साथ मिलाकर बालों को काला करने के लिए भी प्रयोग में लाई जाती है. इसमें पानी की प्रचुर मात्रा के साथ ही कैल्शियम, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, आयरन, मैग्नीशियम, पोटेशियम, कॉपर व सेलेनियम भी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं.

उन्होंने बताया कि इसमें थायमिन, अराइबोफ्लेविन, बी-सिक्स विटामिन व फाइलो जेनेंथिन भी पाया जाता है. गांव में इस घास को उबालकर इसकी सब्जी बनाकर पालतू शाकाहारी जानवरों को भी खिलाया जाता है, जिससे उनका पाचन ठीक रहे. वहीं अब हर्बल चाय के रूप में इस औषधीय गुणों से भरपूर पौधे का व्यावसायिक उपयोग भी किया जाने लगा है.

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