हिमांशु जोशी/ पिथौरागढ़. उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में सरकारी स्कूलों की हालत समय के साथ खस्ताहाल होते जा रही है. शिक्षकों को कमी से लगातार सरकारी स्कूलों से जनता का मोहभंग हो रहा है, जिसका असर यह हुआ है कि पहाड़ के अधिकांश दूरदराज वाले इलाकों में छात्र संख्या 10 से कम और कई जगह तो शून्य हो गई है. शिक्षा महकमा सरकारी स्कूलों की स्थिति को सुधारने के लिए अभी तक कोई ठोस नीति नहीं बना सका है. हालात तो यह है कि स्कूल में सबसे महत्वपूर्ण पद प्रधानाचार्य का होता है, जिसका पिथौरागढ़ जिले में काफी टोटा है. यहां 200 से ज्यादा स्कूलों में मात्र 13 प्रधानाचार्य ही तैनात हैं. विभाग अन्य स्कूलों में प्रभारी प्रधानाचार्य के भरोसे अभी तक शिक्षण प्रक्रिया चला रहा था लेकिन शिक्षकों के प्रभारी पद छोड़ देने के ऐलान के बाद एक बार फिर जिले के स्कूल अनाथ हो गए. इस कमी को पूरा करने के लिए अब बाबूओं को इसकी जिम्मेदारी देने का फैसला किया गया है.
मुनस्यारी और धारचूला में बाबू संभालेंगे प्रधानाचार्य पद
पिथौरागढ़ के धारचूला और मुनस्यारी विकासखंड में खण्ड विकास अधिकारी ने बाबूओं को प्रधानाचार्य का प्रभार सौंपा है, जिससे स्कूलों की प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाया जा सके. पिथौरागढ़ के शिक्षा अधिकारी हवलदार प्रसाद ने जानकारी देते हुए बताया कि जिले में प्रधानाचार्य के पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं. शिक्षकों के प्रभारी प्रधानाचार्य के पद छोड़ने के बाद एक बार फिर विभाग को काम सुचारू रखने में परेशानी आ रही है. उन्होंने कहा कि खंड शिक्षा अधिकारी ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह फैसला लिया है. इस संबंध में विभागीय आदेश उनकी तरफ से जारी नहीं हुआ है.
मिनिस्ट्रियल एसोसिएशन में नाराजगी
मिनिस्ट्रियल स्टाफ को प्रधानाचार्य की जिम्मेदारी दिए जाने से अजीब से हालात पैदा हो रहे हैं. आलम यह है कि मिनिस्ट्रियल फेडरेशन ने भी अब विभाग के इस कदम की खिलाफत शुरू कर दी है. मिनिस्ट्रियल फेडरेशन के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह राणा ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि बाबूओं को प्रिंसिपल का काम देना नियमों के खिलाफ तो है ही, साथ ही इस कदम से मिनिस्ट्रियल स्टाफ पर काम का दबाव भी बढ़ रहा है.
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FIRST PUBLISHED : December 7, 2023, 17:17 IST
