हिमांशु जोशी/ पिथौरागढ़. उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में स्थित गांवों से पलायन थमने का नाम नहीं ले रहा है. वजह है कि आज तक राज्य के पहाड़ी जिलों के गांवों में मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं. एक तरफ जहां पूरा देश समय के साथ तरक्की कर रहा है, वहीं उत्तराखंड के ग्रामीण इलाके ठीक इसके विपरीत बदहाल होते जा रहे हैं. किसी भी क्षेत्र में विकास के लिए सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार महत्वपूर्ण है लेकिन इसमें सबसे जरूरी चीज है शिक्षा, जो इस आधुनिकता के दौर में सबसे जरूरी है. अब उत्तराखंड में विडंबना यह है कि यहां 3000 से ज्यादा सरकारी स्कूल छात्र संख्या कम होने के कारण बंद होने जा रहे हैं. वहीं पिथौरागढ़ की बात करें तो यहां 300 से ज्यादा स्कूल बंद किए जाएंगे. ऐसा ही एक स्कूल है गुरना क्षेत्र का सिरपोली प्राथमिक विद्यालय, जो करीब 123 साल पुराना है. यहां से कई पीढ़ी शिक्षा ग्रहण कर सर्वोच्च पदों पर भी पहुंची है लेकिन शिक्षा विभाग के स्कूल बंद करने के फरमान के बाद यहां के स्थानीय लोगों में बेहद नाराजगी देखने को मिली.
इस क्षेत्र में एकमात्र एक शताब्दी पुराने स्कूल को बंद करना ग्रामीणों की भावनाओं को आहत कर रहा था. जिसके बाद भारी जन विरोध और सरकार की विफलता सामने आने के बाद अब विभाग ने इस स्कूल को दोबारा खोलने का फैसला किया है. जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी एसपी सेमवाल ने इस बात की जानकारी देते हुए कहा कि सिरपोली स्कूल के ऐतिहासिक महत्व और जन भावनाओं की कद्र करते हुए इस स्कूल को दोबारा खोलने का निर्णय लिया गया है और एक शिक्षक की तैनाती भी कर दी गई है.
छात्र संख्या बढ़ाने का हो रहा प्रयास
सिरपोली प्राथमिक पाठशाला को दोबारा स्थापित करने के लिए तमाम संगठन भी आगे आए. यहां के जनप्रतिनिधि राजेंद्र भट्ट ने बताया कि वह घर-घर जाकर अभिवावकों को अपने गांव के ही स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए जागरूक कर रहे हैं. साथ ही उन्होंने बताया कि स्कूल की स्थिति को सुधारने के लिए यहां के भूतपूर्व छात्र जो ऊंचे पद पर कार्यरत हैं, सभी ने मदद का भरोसा भी दिलाया है.
बेहतर शैक्षिक माहौल बना चुनौती
गौरतलब है कि जिले में सिर्फ सिरपोली ही नहीं और भी ऐसे कई स्कूल हैं, जहां शिक्षा विभाग समय रहते न तो इन विद्यालयों के भवन सुधार पाया है और न ही यहां की शिक्षा व्यवस्था को, जिससे आज पहाड़ों में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए अपने बच्चों को बेहतर शैक्षिक माहौल देना एक बड़ी चुनौती बन गया है.
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FIRST PUBLISHED : December 4, 2023, 11:39 IST
