हिंदी साहित्य के कालिदास चंद्र कुंवर बर्तवाल, दुनिया को दिया अनमोल रचनाओं का खजाना


कमल पिमोली/ श्रीनगर गढ़वाल. हिमालय की गोद में रहने वाला वह कवि जिसे हिन्दी साहित्य का ‘कालिदास’ कहा जाता है, जिनकी कविताओं में प्रकृति के प्रति प्रेम झलकता है, जिसने अपनी जरा सी उम्र में वो मुकाम हासिल कर लिया, जिसे कई साहित्यकार ताउम्र भी हासिल नहीं कर पाए. अपने काव्य से हिंदी साहित्य को अनमोल रचनाओं का खजाना देने वाले चंद्र कुंवर बर्तवाल (Chandra Kunwar Bartwal) को जो प्रसिद्वि जीते जी मिलनी चाहिए थी, वह मृत्यु के बाद मिली. आज भी चंद्र कुंवर बर्तवाल के साहित्यों पर पूरी तरह कार्य नहीं हुआ है. उन्हें हिंदी साहित्य के कालिदास के साथ-साथ ‘हिमवंत कवि’ के रूप में भी जाना जाता है.

चंद्र कुंवर बर्तवाल की कविताओं पर शोध कर रही गढ़वाल विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की शोध छात्रा रेशमा बताती हैं कि हिमवंत कवि बर्तवाल का जन्म मंदाकिनी घाटी के मालकोटी गांव (वर्तमान में रुद्रप्रयाग जिला) में 1919 में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई. बचपन से ही उनकी साहित्य में दिलचस्पी थी. वह कविताएं लिखते रहते थे.

लखनऊ में पंत और निराला से हुई दोस्ती

बर्तवाल ने डीएवी से बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की. 1941 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में एमए में प्रवेश लिया, जहां उनका परिचय छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत, निराला और महादेवी वर्मा से हुआ. जिसके बाद से कुंवर की कविताओं में छायावाद की झलक भी दिखने लगी. रेशमा बताती हैं कि चंद्र कुंवर बर्तवाल ने हिमालय, प्रकृति के अलावा छायावाद के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन, छुआछूत और साम्प्रदायिक उन्माद पर प्रगतिवादी रचनाएं लिखीं.

‘चंद्र कुंवर ने हिमालय को जिया है’

रेशमा बताती हैं कि हिमालय और प्रकृति को लेकर सुमित्रानंदन पंत और निराला ने भी रचनाएं लिखी हैं, लेकिन चंद्र कुंवर बर्तवाल ने हिमालय को जिया है. वह हिमालय में ही जन्मे, यहीं पले-बढ़े व यहीं उनकी मृत्यु हुई. इसलिए उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से हिमालय दिखता है. आगे जानकारी देते हुए वह बताती हैं कि चंद्र कुंवर लिखते हैं, ‘मेरे काव्य का नायक हिमालय है. हिमालय के नायक कालिदास थे, इसलिए में कालिदास को अपना आराध्य मानता हूं.’

‘टीबी हुआ तो अपनों ने भी ठुकराया’

चंद्र कुंवर बर्तवाल जब छय रोग (TB) से ग्रसित हुए, तो उनका नैनीताल जिले के भवाली स्थित टीबी सेनिटोरियम में इलाज करवाया गया. परिजनों द्वारा उनके लिए अगस्तमुनि के पास पवालिया में घर बनाया गया. चंद्र कुंवर अकेले ही वहां रहने लगे, क्योंकि उस दौर में छय रोग को छुआछूत की बीमारी माना जाता था, इसलिए सभी उनसे दूर रहने लगे. बीच-बीच में उनके परिजन उनको देखने के लिए आया करते थे. बर्तवाल ज्यादा वक्त नदी, पहाड़ और प्रकृति के बीच ही रहते थे, जिसके चलते उनकी अनगिनत रचनाएं पहाड़ प्रकृति की हैं. आखिरकार टीबी की बीमारी से जंग लड़ते हुए 1947 में मात्र 28 साल की उम्र में हिमालय के पुत्र ने हिमालय की गोद में ही दम तोड़ दिया.

मृत्यु के बाद मिली प्रसिद्धि

बताया जाता है कि जब चंद्र कुंवर की मृत्यु हुई, तो उनकी बहुत सी साहित्यिक रचनाएं उनके बाकी सामानों के साथ जला दी गईं, लेकिन उनकी काफी रचनाओं को उनके मित्र शम्भू प्रसाद बहुगुणा और बुद्धि बल्लभ थपिलयाल ने संरक्षित कर लिया और उन्हें प्रकाशित किया. जिसके बाद चंद्र कुंवर बर्तवाल को हिंदी साहित्य जगत में प्रसिद्धि मिली. जब उन्हें छय रोग था, उस दौरान निराला का उनसे पत्राचार होता रहता था. शोध छात्रा रेशमा मानती हैं कि उनकी रचनाओं को स्कूल और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए. कविताओं के अलावा भी उनके द्वारा लिखा साहित्य जिसमें एकाकी, यात्रा साहित्य, डायरी लेखन ये सब भी अगर सामने आए, तो हिंदी जगत को बहुत कुछ मिल सकता है.

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