Bageshwar News : युवा पीढ़ी चाह ले तो बच जाएगी कुमाऊं की 'आत्मा', रोचक है इस यंत्र से रिश्ता, इस शख्स ने अब तक जिंदा रखा
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Bageshwar news in hindi : ये ढोल के मुकाबले छोटा, लेकिन तेज आवाज करता है. पुराने समय का साथी रहा है. बागेश्वर जिले के शामा गांव में शेर सिंह कोरंगा आज भी इसे बनाते हैं. इसकी कीमत हजारों में है.
शेर सिंह कोरंगा की ओर से बनाया गया हुड़का
हाइलाइट्स
- शेर सिंह हुड़का बनाने की परंपरा जीवित रखे हुए हैं.
- हुड़का कुमाऊं की आत्मा से जुड़ा प्रतीक है.
- युवा पीढ़ी की रुचि से यह परंपरा जीवित रह सकती है.
बागेश्वर. उत्तराखंड की संस्कृति और लोक परंपराएं आज भी कई गांवों में जीवित हैं. इन लोक परंपराओं के तार कई पारंपरिक वस्तुओं से भी जुड़े हैं. ऐसी ही एक लोक विरासत हुड़का है, जो उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्रों में से एक है. यह वाद्य यंत्र खासतौर पर कुमाऊं क्षेत्र में लोक गीतों और मांगलिक आयोजनों में बजाया जाता है. हुड़के का उपयोग खासतौर पर जागर गायन में किया जाता है. यह ढोल के मुकाबले छोटा, लेकिन तेज आवाज वाला वाद्य होता है. जिसे कमर में लटकाकर या हाथ में पकड़कर बजाया जाता है. पुराने समय में जब मनोरंजन के आधुनिक साधन नहीं हुआ करते थे, तब गांवों में काम के समय महिलाएं सामूहिक रूप से गीत गाती थीं. उनके बीच में एक पुरुष हुड़का बजाया करता था.
पुरखों से सीखा
बागेश्वर जिले के शामा गांव में रहने वाले शेर सिंह कोरंगा आज भी इस पारंपरिक हुनर को जिंदा रखे हुए हैं. उनकी बहू खष्टी कोरंगा ने बताया कि वे बचपन से ही अपने पिता और बुजुर्गों को हुड़का बनाते देखते आए और धीरे-धीरे इस कला में पारंगत हो गए. अब जब उनकी उम्र 65 के पार हो चुकी है. अब वे नियमित रूप से नहीं, लेकिन डिमांड पर हुड़के तैयार करते हैं. एक हुड़का बनाने के लिए लकड़ी, चमड़ा और रस्सियों की आवश्यकता होती है. यदि सारी सामग्री एकत्र हो जाए तो वे एक दिन में ही पूरा हुड़का बना सकते हैं. उनके बनाए हुड़के की कीमत 1200 से 3000 रुपये तक होती है. जो साइज और क्वालिटी के अनुसार तय होती है.
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पुरखों की धरोहर
अब कई सांस्कृतिक समूह, स्कूल-कॉलेज के कलाकार और लोक गीतों के प्रेमी उनसे ऑर्डर पर हुड़के बनवाते हैं. हालांकि आधुनिकता की दौड़ में यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है, लेकिन शेर सिंह को उम्मीद है कि यदि युवा पीढ़ी इसमें रुचि ले तो यह परंपरा जीवित रह सकती है. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि शेर सिंह कोरंगा जैसे लोग हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए हुए हैं. ऐसे पारंपरिक कारीगरों को प्रोत्साहन मिलना बेहद जरूरी है, ताकि कुमाऊं की यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक भी पहुंच सके. यदि आप भी इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को अपने घर या सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहते हैं, तो शामा गांव पहुंचकर या संपर्क कर ऑर्डर दे सकते हैं. यह न केवल एक वाद्य यंत्र है. बल्कि कुमाऊं की आत्मा से जुड़ा एक सांस्कृतिक प्रतीक भी है.