Haldwani News : ऐपण के जरिए कुमाऊं की लोककला को घर-घर तक पहुंचाना चाहती हैं नैनीताल जिले की पूजा पडियार

Haldwani News : ऐपण के जरिए कुमाऊं की लोककला को घर-घर तक पहुंचाना चाहती हैं नैनीताल जिले की पूजा पडियार


पवन सिंह कुंवर/हल्द्वानी. उत्तराखंड के ओखलकांडा ब्लॉक के भिड़ापानी निवासी पूजा पडियार ने ऐपण बनाने में महारत हासिल की है और उनके बनाए ऐपण देश के अलग-अलग कोनों में लोगों के घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं. पूजा ने बताया कि वह पिछले 16-17 वर्षों से अपने परिवार के साथ भीमताल में रह रही हैं.रंगोली भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा और लोक-कला है. अलग-अलग प्रदेशों में रंगोली के नाम और उसकी शैली में भिन्नता हो सकती है लेकिन इसके पीछे निहित भावना और संस्कृति में समानता है. इसकी यही विशेषता इसे विविधता देती है और इसके विभिन्न आयामों को भी प्रदर्शित करती है. रंगोली को उत्तराखंड में ऐपण नाम से जाना जाता है. उत्तराखंड में ऐपण का अपना एक अहम स्थान है लेकिन विगत कुछ वर्षों से ऐपण कला और कुमाऊंनी लोक कला धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है.

मूलरूप से नैनीताल जनपद के ओखलकांडा निवासी पूजा पडियार अपनी ऐपण कला के जरिए लोक कलाओं को सहेजने, लोक कलाओं को जीवंत रखने व कुमाऊंनी संस्कृति को देश में ही नही बल्कि विदेशों तक पहुंचाने का काम कर रही हैं. यही नहीं, पूजा स्कूलों में जाकर भी बच्चों को कुमाऊंनी संस्कृति और ऐपण की शिक्षा देती हैं. उनका मकसद है कि ऐपण पूरे देश में जाना जाए और इस तरह वह कुमाऊंनी संस्कृति को आगे बढ़ाना चाहती हैं.

कुमाऊंनी कल्चर से सुसज्जित विभिन्न उत्पादों का हो रहा निर्माण
पूजा ऐपण से कुमाऊंनीकल्चर की नेम प्लेट, कुमाऊंनी टोपी, शादी-विवाह की चौकी, फोटो फ्रेम और लकड़ी के उत्पादों पर भी ऐपण के खूबसूरत डिजाइन बनाती हैं . कुमाऊंनी टोपी की कीमत 100 से 150 रुपये और फोटो फ्रेम, नेम प्लेट की कीमत 100 से ₹500 तक है. ऐपण से सजे कुर्ते और टीशर्ट भी उपलब्ध हैं. कुर्ते की कीमत ₹2000 है, तो टीशर्ट की कीमत 1200 से 1500 रुपये तक है. साथ ही पूजा जूट बैग भी बनाती हैं, जिनकी कीमत ₹500 है.

कुमाऊं की संस्कृति संरक्षित करने का एक छोटा प्रयास
पूजा विभिन्न विभागों के सहयोग से अलग अलग आयोजनों पर अपने स्टॉल लगाकर उत्पादों का प्रदर्शन करती हैं. ऐपण क्रिएशन नाम से वह अपने उत्पादों को बेचती हैं. इसके लिए उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर पेज बनाया है. वहां भी लोग उनसे संपर्क कर उत्पादों को आर्डर करते हैं.पूजा पडियार ने कहा कि बचपन से ही कुमाऊंनी संस्कृति के प्रति उनका काफी रुझान रहा है और बीते दो सालों से विलुप्त हो रही कुमाऊं की संस्कृति को बचाने के लिए ऐपण के जरिए एक छोटी सी कोशिश कर रही हैं. उन्होंने कहा कि उनके ऐपण की विभिन्न राज्यों के लोगों द्वारा मांग की जा रही है. उनको काफी अच्छा लगता है कुमाऊंनी संस्कृति को कुमाऊं में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों के लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है.

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