बागेश्वरः मशहूर शायर शाकी अमरोही कहते हैं कि मंजिलें लाख कठिम आएं, गुजर जाऊंगा, हौसला हार के बैठूंगा तो मर जाऊंगा. उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के दीपक कांडपाल की भी कहानी कुछ ऐसी ही है. गरीबी और संघर्षों से भरा जीवन होने के बावजूद दीपक ने हार नहीं मानी और आज वह एनडीए यानी कि नेशनल डिफेंस एकेडमी का सितारा बन गए हैं. दीपक कांडपाल की मेहनत और हौसले ने इतिहास रच दिया है. दीपक की इस सफलता से उत्तराखंड की पहाड़ियों ने एक बार फिर देश को एक नया नायक दिया है.
‘कभी सपनों को हालात से छोटा नहीं होने दिया’
बागेश्वर जिले के गरुड़ क्षेत्र के दीपक कांडपाल ने पुणे में आयोजित एनडीए की 149वीं पासिंग आउट परेड में राष्ट्रपति गोल्ड मेडल हासिल कर इतिहास रच दिया. यह मेडल एनडीए का सर्वोच्च सम्मान है और इसे वही कैडेट प्राप्त करता है, जो तीन वर्षों की कठिन ट्रेनिंग में हर क्षेत्र में सबसे बेहतर प्रदर्शन करता है. दीपक को यह सम्मान “चीफ ऑफ द नेवल स्टाफ एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी” ने प्रदान किया. यह पल दीपक के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए गर्व का क्षण बन गया. सम्मान मिलने के बाद दीपक ने न्यूज18 को बताया, ‘मेरे लिए हर संघर्ष एक सीढ़ी था. हालात कठिन थे, लेकिन मैंने कभी अपने सपनों को हालात से छोटा नहीं होने दिया.’ उनका यह बयान उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखते हैं.
एक कमरे की सीमाओं में पनपा बड़ा सपना
दीपक एक लोअर मिडल क्लास परिवार से आते हैं. उनके पिता जीवन चंद्र कांडपाल टैक्सी चलाते हैं और परिवार आज भी गरुड़ कस्बे में एक किराए के कमरे में रहता है. कठिन हालातों के बावजूद दीपक का सपना बड़ा था और वह सपना था एनडीए में जाना और देश की वर्दी पहनना. दीपक कहते हैं, ‘जब घर में सुविधाएं कम थीं, तब मैंने खुद से एक ही वादा किया था कि मेहनत मेरी सबसे बड़ी ताकत होगी.’
स्कूल से नवोदय तक हर जगह दीपक अव्वल
दीपक ने 8वीं तक की पढ़ाई सेंट एडम्स पब्लिक स्कूल से की और फिर जवाहर नवोदय विद्यालय से बारहवीं की. दीपक ने जब 12वीं पास किया तो वह जिले के टॉपर बने. दीपक के शिक्षकों का कहना है कि दीपक हर प्रतियोगिता, हर गतिविधि में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते थे.
दिल्ली में संघर्ष और तैयारी
एनडीए ज्वाइन करने की इच्छा को पूरा करने के लिए दीपक ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. उन्होंने कॉलेज के साथ-साथ एनडीए कोचिंग की तैयारी जारी रखी. वर्ष 2022 में चयन हुआ और यही से शुरू हुई उनकी असली परीक्षा.
एनडीए के तीन साल, कठोर अनुशासन, निरंतर मेहनत
एनडीए में प्रशिक्षण अत्यंत कठिन होता है. शारीरिक ड्रिल, obstacle course, अकादमिक परीक्षाएं, नेतृत्व क्षमता की निरंतर परीक्षा. लेकिन दीपक हर दिन अपनी सीमाओं को चुनौती देते रहे. वे बताते हैं, “जब भी मुश्किल टास्क आता था, मैं खुद को यही याद दिलाता था कि मेरे गांव में मुझसे बड़ी उम्मीदें लगी हैं.”
बागेश्वर और गरुड़ में जश्न का माहौल
दीपक की उपलब्धि की खबर जैसे ही गरुड़ पहुंची, पूरा इलाका गौरव से भर उठा।परिवार के छोटे किराए के कमरे में खुशी और गर्व का माहौल था।सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बाढ़ आ गई है. दीपक कांडपाल ने दिखा दिया, “सपनों को पाने के लिए अमीरी नहीं, इरादे बड़े होने चाहिए.” उनकी यह कहानी उन सभी युवाओं के लिए रोशनी है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद ऊँची उड़ान भरने का हौसला रखते हैं.
