अंतरराष्टÑीय महिला दिवस विशेष : बुलंद हौसलों वाली शोभा कंवर ने बदली स्कूल की हालत

बून्दी। जिसने कभी खुद पढ़ाई के लिए संघर्ष किया, वो बन रही है अब उन बच्चों की मददगार जो किसी कारणवश पढ़ाई बीच मे छोड़ देते हैं, ऐसा कहना है केबीसी वाली मेम शोभा कंवर का। बचपन में 8 वीं के बाद दादीसा ने कहा पढ़ाई छोड़ दो, वो तो मां ने साथ दिया और हायर सेकंडरी कर के एसटीसी की। जीवन के लिए भी संघर्ष करते हुए सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र में हार्ट के वॉल्व का आॅपरेशन करवा कर मौत से दो-दो हाथ भी किये। शादी के बाद फिर से पढ़ाई के लिए संघर्ष और 16 साल बाद बिना किसी कोचिंग के 2007 में आरपीएससी की परीक्षा पास कर शिक्षक के रूप में नए जीवन की शुरूआत की। बच्चों के बीच कैलिफोर्निया वाली मेम से अब केबीसी वाली मेम बनी शोभा कंवर ने पहली पोस्टिंग के विद्यालय में भी अनेकों संघर्ष किये। पहले नामांकन के लिए, फिर स्कूल को अतिक्रमण से मुक्त कर बाउंड्री वाल बनाने से लेकर गांव को ओडीएफ कराने के लिए भी संघर्ष रहा। उसके बाद सीनियर विद्यालय में बालिकाओं के प्रवेश को लेकर संघर्ष भी किया, क्योंकि यहां पहले सिर्फ कक्षा 9 से ही बालिकाओं को प्रवेश दिया जाता था। अब यहां कक्षा 1 से ही बालिकाओं का प्रवेश होता है। फिर विद्यालय में व्यवस्थाओं में सुधार किया। इन्होंने टीन शेड, वाटर कूलर, फर्नीचर, यूनिफॉर्म, स्वेटर, बैग्स व अन्य व्यवस्थाओं को भामाशाहों व स्वयं के प्रयासों से सुधारा।

जॉब के साथ अपनी पढ़ाई भी की पूरी
एसटीसी के बाद 16 साल बाद बिना किसी कोचिंग के 2007 में आरपीएससी की परीक्षा पास कर लेवल -1 शिक्षिका बनने वाली शोभ कंवर ने अपने जॉब के साथ अपनी उच्च शिक्षा को भी जारी रखा। इन्होंने बीए, बीएड, राजनीति विज्ञान में एमए के साथ गाइडेंस व काउंसलिंग में डिप्लोमा कर छात्राओं को लाभान्वित करने कार्य निरन्तर कर रही हैं। इसी बीच बच्चों के लिए उनकी हर संभव प्रयास भी जारी हैं। उन्होंने अपनी छात्राओं के लिए विद्यालय में अंग्रेजी में सुधार के लिए अलग व्यवस्था की। नेशनल मिन्स कम मेरिट स्कॉलरशिप के लिए बच्चों में रुझान पैदा किया और पिछले 4- 5 सालों में 7 बच्चों का सलेक्शन भी हुआ, जिनके लिए अलग से कक्षाएं भी लगवाई। राजस्थान शिक्षा विभाग ने इस साल मुझे शिक्षक सितारे से भी नवाजा है।

11 लाख रुपए की सहायता प्राप्त की अमिताभ बच्चन से
22 सालों के संघर्ष के पश्चात केबीसी में भी जीत हासिल की और 11 लाख रुपए सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से भी उपहार स्वरूप मेरी उन बालिकाओं के लिए प्राप्त किये जिन्हें मैं हर साल गोद लिया करती थी। मैं पढ़ाई के लिए ऐसी बच्चियों को गोद लेती हूँ, जिनके माता-पिता में से कोई एक न हो या दोनों। या फिर किसी कारणवश उस बच्ची को पढ़ाई में परेशानी आ रही हो। केबीसी से मिली धनराशि से मैंने अभी अपनी एक सोसायटी बनायी है, जो शिक्षा के क्षेत्र में ही कार्य कर रही है। इस सत्र में इस सोसायटी ने 1 लाख रु मूल्य की शिक्षण सामग्री कोटा, बून्दी के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के राजकीय विद्यालयों के बच्चों को भिजवाई है। कई बच्चों की फीस भरी है। कक्षा 10, 12  की सरकारी स्कूलों की बच्चियों को हवाई यात्रा भी करवाई है। अभी महीने में 2 बार गुड टच व बेड टच का प्रशिक्षण भी दे रही हूं। अब तक हजारों बच्चों को प्रशिक्षित किया है। इसी कारण महिला एवं बाल विकास विभाग राजस्थान द्वारा 2020 में मुझे गरिमा अवार्ड भी प्रदान किया गया। जिसकी 25 हजार रु की राशि भी मैने ऐसी ही बालिकाओं व बालको की फीस वगैरह देने में खर्च की। इनका यह सफर निरंतर जारी है।
  
ज्योति ने 500 रुपए में अचार बनाना शुरु किया अब अन्य महिलाओं को भी  दे रही रोजगार
हिंडोली। कोरोना महामारी के दौरान 4 साल पूर्व पति की कोटा में मेडिकल शॉप बंद हो गई। जिससे पति का बिजनेस खत्म हो गया था। ऐसे में परिवार आर्थिक तंगी से जूझने लगा था। ऐसे में ज्योति ने मेहनत की ओर अचार बनाने का काम शुरू किया। महज 500 में अचार बनाने का काम शुरू किया और अब उनके तैयार अचार की पूरे प्रदेश से डिमांड आ रही है। यहीं नहीं ज्योति अपने साथ सहयोगी दस अन्य महिलाओं को भी रोजगार देकर उनका परिवार भी चला रही है। आज 13 तरह के अचार बनाकर ज्योति को जिले का सर्वोच्च सम्मान कृषि रत्न अवॉर्ड से नवाजा गया। ज्योति नकलंक ने बताया कि चार साल पूर्व महज 500 में अचार बनाने का काम शुरू किया और अपने परिचितों को दिया । तब उन्होंने उनके तैयार अचार को सराहा। एक दिन पता चला की बूंदी में केवीके एक संस्था हैजो प्रशिक्षण देती हैे। मैंने उससे संपर्क कर 21 दिवसीय प्रशिक्षण लिया और उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। मन लगाकर मेहनत की। आज 13 तरह के अचार जैसे आम, मिक्सर  अचार, नींबू अचार, नींबू- मिर्च अचार, हल्दी,आंवला,लाल और हरी मिर्च जैसे अचार बना रही है।  ज्योति ने बताया कि उनका एक ब्रांड पूरे मेथी दाना अचार है। जो शरीर के लिए बहुत उपयोगी है।  ज्योति  ने बताया कि कोरोना काल में वह और उसके पति थैली में आचार के डिब्बे रख गांव और शहर शहर जाते थे और दुकानदारों से कहते थे कि माल बिकने के बाद पैसा देना।  ऐसा करने पर आज दुकानदार स्वयं माल मांग रहा है। ज्योति ने बताया कि प्रतिदिन 50 किलो अचार की सेल हो रही है  और राजस्थान के बूंदी कोटा टोंक सहित कई जिलों में अचार की मांग आने लगी है। 

 10 महिलाओं को रोजगार
 ज्योति ने बताया कि आज ज्योति के पास 10 महिलाएं काम कर रही हैं और प्रत्योक महिला को 6000 महीना देता हूं। इनके सहयोग से मेरा व्यापार बढ़ रहा है और महिलाएं भी मेरे पास काम की तलाश में आ रही है। आवश्यकता पड़ने पर स्टाफ बढ़ाया जावेगा।
 
4 साल में चार सम्मान मिले
ज्योति ने बताया कि 4 वर्ष के व्यापार जीवन में चार सम्मान मिल चुके हैं। पहले नाबार्ड की तरफ से सम्मान मिल चुका है और कृषि विभाग की ओर से राजस्थान में आचार के प्रथम नवाचर पर प्रमाण पत्र और 25000 का नगद पुरस्कार सहित अन्य संस्थाओं से अवार्ड से  भी कुल चार अवार्ड मिल चुके है। ज्योति ने बताया कि अवार्ड मिलने से उनका हौसला बढ़ाया जिससे मेरा बिजनेस और ऊंचाइयां पर पहुंच चुका है।