अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: अकेले संभाल रही स्कूल, ब्यूटीशियन में किया इंटरनेशनल कोर्स

कोटा। महिलाएं आज के समाज की एक अहम हिस्सा हैं, हर क्षेत्र और कार्य में महिलाएं पूरी क्षमता के साथ अपना योगदान दे रही हैं। वहीं वर्तमान परिदृश्य में महिलाएं परिवार चलाने से लेकर देश तक को बखूबी संभाल रही हैं। महिला दिवस को लेकर नवज्योति कि खास सीरीज में आज बात करेंगे, उन महिलाओं की जोे परिवार को संभालने के साथ में बिजनेस, स्कूल और संस्थाएं भी संभाल रही हैं। इसके अलावा अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन के बीच एक बेहतर सामांजस्य बना रही हैं।

मैं नारी; जीतती हूं या सीखती हूं
मुझे गर्व है कि मैं एक नारी हूं। मैं कभी हारती नहीं या तो जीतती हूं या सीखती हूं। मैंने हां मैंने टूटी उम्मीदों से भी किया है अपने अस्तित्व का निर्माण, इस संघर्षमयी जीवन से हौंसलों संग अपने मुकाम पर सदैव रखा है ध्यान। ये पंक्तियां लिखीं हैं वल्लभनगर स्थित शिवज्योति स्कूल की निदेशक सावित्री गुप्ता ने जिनका जीवन इन पंक्तियों की तरह ही संघर्षमय रहा। जिन्होंने साल 1983 में स्कूल की स्थापना की और आज अकेले ही उसे बेहतरीन रूप से संचालित कर रही हैं। सावित्री गुप्ता के जीवन में पारिवारिक से लेकर सामाजिक जीवन में कई उतार चढ़ाव आए लेकिन उन्होंने कभी हार न मानते हुए अपना कार्य जारी रखा। सावित्री कहती हैं कि वो हमेशा खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करती हैं और उसे अपने स्कूल में भी शामिल करती हैं। सावित्री ने अकेले ही स्कूल के साथ में अपनी डेढ़ साल की बेटी को भी संभाला। सावित्री स्कूल का संचालन करने से पहले शिक्षक रही हैं, जिससे उन्हें विद्यालय का संचालन करने में भी काफी सहायता मिलती है। सावित्री कहती हैं कि महिला हो या पुरूष उसे कभी भी परिस्थितियों से घबराना नहीं चाहिए और हर स्थिति का डटकर सामना करना चाहिए क्योंकि किसी भी परिस्थिति से लड़ने के लिए पहले आपका मजबूत होना जरूरी है।

लड़कियों की पढ़ाई में दिया सहयोग
किसी उद्देश्य को निर्धारित करना और उसके तहत सामाजिक सेवा कार्य करना एक मजबूत व्यक्तित्व की पहचान होती है। अभिलाषा क्लब की अध्यक्ष प्रियंका गुप्ता कुछ ऐसा ही व्यक्तित्व की धनी हैं। जिन्होनें समाजिक सेवा के उद्देश्य से करीब 5 साल पहले अपने साथियों के साथ मिलकर अभिलाषा क्लब की स्थापना की। प्रियंका गुप्ता और उनका क्लब समाज में बेटी बचाव और बेटी पढ़ाओ के बैनर तले कई समाजिक कार्य करते हैं। प्रियंका बताती हैं कि एक बार बैठे बैठे ही सहेलियों ने क्लब बनाकर सामाजिक कार्य करने का फैसला लिया जिसमें वो अभी तक 12 बालिकाओं की पूरी पढ़ाई करा चुकी हैं। साथ ही कई महिलाओं को रेड़ियां खुलवाकर उनकी आर्थिक सहायता कर चुकी हैं। वहीं प्रियंका ने कोरोना काल के दौरान लगे लॉकडाउन में क्लब के माध्यम से कई लोगों को राशन व चिकित्सा सामग्री भी उपलब्ध कराई है। प्रियंका बताती हैं कि सामाजिक कार्य करने और घर संभलने के बीच काफी सामंजस्य बनाना होता है ताकी कहीं कोई कमी ना रहे। क्लब के माध्यम से सामाजिक काम करना उन्हें पसंद है और लोगों की मदद करके अच्छा महसूस होता है। इसके अलावा प्रियंका का कहना है कि आज के दौर में लड़कियों को करियर और परिवार के बीच सामंजस्य बनाकर चलना सीखना चाहिए क्योंकि आपका परिवार ही आपकी ताकत होता है। 

एक डॉक्टर की तरह ब्यूटीशियन का काम
कोटा की प्रसिद्ध ब्यूटीशियन नीता पारेख बताती हैं कि एक ब्यूटीशियन का काम डॉक्टर की तरह होता है जिसमें सभी एलीमेंट्स का उपयोग ध्यान में रखकर करना पड़ता है। नीता पारेख ने अपने ब्यूटीशियन का करियर साल 1988 में शुरू किया था। नीता बताती हैं कि करियर के शुरुआती दिनों में लोग सिर्फ विशेष आयोजनों के दौरान ही मेकअप कराया करते थे, तो लोग इस फिल्ड में करियर कम बना पाते थे। लेकिन नीता ने ब्यूटीशियन के रूप में ही अपना करियर बनाने के लिए आगे की पढ़ाई जारी रखी और कई डिप्लोमा और डिग्रियां हासिल की। नीता ने इंस्टीट्यूट आॅफ हेयर ड्रेसर एंड ब्यूटीशियन कोलंबो से सीडेस्को की डिग्री पूरी की हुई है जो ब्यूटीशियन की सबसे अखिरी डिग्री मानी जाती है। नीता कहती हैं कि आज लड़कियां सोशल मीडिया और यूट्यूब से मेकअप करना सीख जाती हैं जो ठीक नहीं है। आज लोग बिना विशेष आयोजन के भी मेकअप करते हैं ऐसे में जिम्मेदारी बढ़ जाती है। नीता पार्लर पर लड़कियों को तो सीखाती हैं ही साथ ही कई फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं। नीता का कहना है कि लडकियों को हमेशा कॉन्फिडेंट रहना चाहिए और जो भी वो करें उसे खुलकर करना चाहिए जिससे अपना बेहतर दे पाएं।

मुश्किल होने के बाद भी स्थापत्य में की पीएचडी
कोटा जेडीबी कॉमर्स कॉलेज की प्रिंसिपल रहीं सुषमा आहुजा हाड़ौती की स्थापत्य और मंदिरों में नारी के रुपों में बनी प्रतिमाओं पर भी किताब लिख चुकी हैं। सुषमा आहुजा ने 1979 में कोटा कॉलेज से इतिहास में स्नात्कोत्तर किया और वहीं अस्थाई लेक्चरर के रुप में पढ़ाना शुरु कर दिया। जिसके बाद पढ़ाते हुए ही 1982 में आरपीएससी की परीक्षा पास कर स्थाई हुई। साथ ही आरएएस की भी परीक्षा पास भी लेकिन पढ़ाने की इच्छा के चलते लेक्चरर ही रही। सुषमा आहुजा ने लेक्चरर रहते हुए ही हाड़ौती की स्थापत्य और कला में शोध कार्य किया। सुषमा बताती हैं कि शोध कार्य के दौरान वो क्षेत्र के कई दूरस्थ इलाकों के साथ ऐसे क्षेत्रों में भी जहां लोग कम ही जाते हैं। सुषमा पीएचडी करने के बाद भी अपना शोध कार्य जारी रखे हुए हैं वहीं वो कोटा लायंस क्लब की अध्यक्ष के रूप में सामाजिक सेवा कार्य भी करती हैं। सुषमा अहुजा हाड़ौती: कला और स्थापत्य की समृद्ध विरासत तथा सत्यम शिवम सुंदरम: फीमेल फिगराइन इन टेंपल आर्ट नामक दो किताबें भी लिख चुकी हैं, जो कोटा के स्थापत्य विरासत और भारतीय समाज में महिलाओं किस तरह से प्रतिष्ठित माना गया है पर आधरित हैं। सुषमा स्वयं और क्लब के माध्यम से महिलाओं को शिक्षा और सामाजिक रूप से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने के साथ उनकी सहायता भी करती हैं।