उसके नयनों का पानी है खारा ,‘मां’ है गंगा की निर्मल धारा
कोटा । चाहे तेज धूप हो या हो काली अंधियारी, मां का आसरा धूप को छाया में अंधेरे को उजाले में बदल देता है। गमों के साए हो या हो जिंदगी के तूफान, मां का आसरा गम को खुशी में और तूफानों में साहिल बन जाता है। आज 12 मई को दुनियाभर में मातृ दिवस या मदर्स डे सेलिब्रेट किया जा रहा है । प्रत्येक वर्ष मई महीने में हर दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है। हर मां को समर्पित होता है यह स्पेशल डे। वैसे तो हर दिन ही मां का दिन होता है। हर किसी के जीवन में मां का दर्जा सबसे ऊपर होता है। मां के बिना एक बच्चे की जिंदगी या यूं कहे कि दुनिया अधूरी है, मां है तो जहान है । मदर्स डे के अवसर पर दैनिक नवज्योति ने शहर के कुछ प्रबुद्धजनों से उनकी मां के बारे में जाना कि किस तरह उन्होंने उनके जीवन में मार्ग दर्शन किया कि आज वो कामयाबी की इबारत लिख समाज के लिए प्रेरणा की मिसाल बनें। जानते हैं उन्हीं की जुबानी।
मेरी मां, मेरी ही नहीं मेरी बेटी की भी रोल मॉडल
जीवन के अनमोल पाठ हमें हमारी मां ही सिखाती है। मेरी मां तपती सेनरॉय मेरे लिए शक्ति स्वरूपा है। आज जिस मुकाम पर मैं पहुंची हूं उसमें मेरी मां का बहुत सहयोग रहा है। वह हाउस वाइफ है जॉब के कारण पिता का ट्रांसफर होता रहता था। मेरी कुछ स्कूलिंग दिल्ली से हुई। दिल्ली से ही लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज से मेडिकल किया। मेरी जॉब के लिए भी मां न्यूज पेपर पढ़कर विज्ञापन बताती थी कि यहां-यहां अप्लाई करो। मां मेरे लिए सब कुछ हैं। नाइट ड्यूटी लगती थी तो वहीं बेटी को संभालती । जब कुछ समय के लिए लंदन गई तब भी बेटी मां के पास रही। बेटी के जन्म के बाद मैंने पोस्ट ग्रेजुएशन किया। मेरी वर्ष 2010 में दिल्ली में पोस्टिंग हुई तब नाइट ड्यूटी हर अल्टरनेट डेज पर होती थी । शहर से बाहर अन्य कई शहरों में भी जाना होता था । ऐसे में मेरी बेटी की देखभाल मेरी मां करती थी । बेटी की 12 वीं बोर्ड की पढ़ाई के दौरान भी उसका ध्यान रखा । आज भी हर दिन शाम को मां से बात करती हूं क्योंकि वह दिल्ली में हैं । मेरी मां मेरी ही नहीं मेरी बेटी की भी रोल मॉडल है।
-डॉ.सुपूर्णा सेनरॉय, चीफ मेडिकल सुपरिंटेंडेट, मेडिकल डिपार्टमेंट, कोटा डिविजन
मां की कमी आज भी महसूस होती है
दुर्भाग्यवश अब मेरी मां नहीं है। मेरी मां रूक्मणी देवी स्वयं पढ़ी लिखी नहीं थी पिताजी भी बहुत अधिक पढ़े लिखे नहीं थे। लेकिन हम सभी भाई बहनों को बहुत अच्छी शिक्षा दी। अब से 33 साल पहले जब बताया कि आरएएस कॉम्पटीशन देगें क्योंकि बहुत टफ कॉम्पटीशन होता है तो उनका सपोर्ट था कि जो प्रतियोगी परीक्षाओं में जाना चाहती हो जाओ। आरएएस में पहली बार में ही सलेक्शन हो गया था। शुरू से उनका कहना था कि आप जो करना चाहती हो वो करो कभी उन्होंने हमें पढ़ाई के लिए, आगे बढ़ने के लिए नहीं रोका । पिता राजस्थान से दिल्ली रोजगार के सिलसिले में माइग्रेट हो गए थे। उन्होंने काफी संघर्ष किया फिर वहां सैटल हो गए मां का हमेशा प्यार व सपोर्ट रहा। वह मेरी प्रबल पक्षधर थी। जीवन के हर स्टेज पर मां का बहुत सपोर्ट रहा । मेरी मां बिल्कुल पढ़ी लिखी नहीं थी वह सिर्फ साइन करना जानती थी । मां से मायका होता है। जब भी सालों बाद, 6 महीने बाद अगर पेरेन्ट्स के घर जाती थी तो मां की मौजूदगी का बहुत सुखद अहसास होता था वो कमी अब बहुत लगती है।
-उर्मिला राजौरिया, संभागीय आयुक्त कोटा
आज भी मां मेरी प्रेरणास्त्रोत है
मां बच्चे के जीवन की रीढ़ की हड्डी होती हैं। आपको खड़ा रखने में मां की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है कि आप कितना मजबूती के साथ खड़ा रहती हैं। मेरी मां डॉ. सरला दुहन हरियाण में कॉलेज प्रोफेसर के पद से रिटायर्ड हुई है। पढ़ाई के मामले में मेरी मां काफी सख्त रहती थी। उन्होंने मेहनत करने की आदत इस तरह हम में डाली कि एक-एक नंबर हमारे लिए मैटर करता था और उसी आदत की वजह से आज हम यहां है। उन्होंने जीवन जीना सिखाया और हमारे नेचर में एक बात डाली कि सही नीयत से मेहनत करने का यह ऐसा मूल्यवान बीज दिया कि उसके कारण आज तक जीवन में मात नहीं खानी पड़ी। मां हमेशा से सपोर्टिव रहीं वही सबसे बड़ी स्ट्रेंथ रहा है। आज भी वह मेरे लिए प्रेरणास्त्रोत है। कभी भी मुझे लगता है कि मैं लो फील कर रही हूं तो देखती हूं कि उन्होंने भी अपने जीवन में इतनी मेहनत की है। जीवन में किसे आसानी से सब मिलता है गांव से निकलकर उन्होंने अपने बच्चों को इतना आगे बढ़ाया मेरा छोटा भाई आईएएस और मैं आईपीएस अधिकारी हूं। पिताजी व माताजी की जब शादी हुई दोनों ने ही शादी के बाद पढ़ाई को जारी रखा और आगे पढ़े व आगे बढ़े। हमें उन्होंने एज्यूकेशन का महत्व समझाया। मां शादी के बाद पढ़ाई पूरी करके प्रोफेसर बनीं। माता पिता दोंनो ने मिलकर हमें मेहनत व कामयाबी की राह दिखाई और काबिल बनाया।
-डॉ. अमृता दुहन, एसपी कोटा शहर
कभी किसी का नुकसान करके आगे नहीं बढ़ना
मां की सिखाई एक-एक चीज ऐसी होती है, जो व्यक्ति को व्यक्तित्व निर्माण में सहायता करती है। यही वजह है कि बचपन में सिखाए सबक, ताउम्र दिमाग और दिल में छप से जाते हैं। हम चार भाई है और चारों भाई अच्छे पदों पर पहुंचे और समाज में नाम किया। इसका श्रेय मां अंजौरा देवी को जाता है वह हाउस वाइफ थी पर मां ने शुरू से हमें यही सिखाया कि शॉर्ट कट नहीं चलना है। हमेशा सही रास्ते पर चलना और सत्य के साथ रहना है। ऐसा कोई काम नहीं करना जिससे दूसरों को नुकसान हो। कभी किसी का नुकसान करके आगे नहीं बढ़ना है यह उनकी बात आज भी हम फॉलो करते हैं। जीवन में कभी भी हिम्मत नहीं हारना, हार नहीं माननी है। लाइफ में पास-फेल होते रहते है। दूसरों से अलग करने का जज्बा होना चाहिए। वर्ष 2008 में मां नहीं रहीं । वाइस चांसलर के पद पर तो वह हमें नहीं देख पाई लेकिन जब आईआईटी की परीक्षा पास कर 1982 में बीएचयू में एडमिशन मिला तो मुझे आज भी वह पल याद आता है कि वह बहुत खुश हुई थी और उन्होंने मोहल्ले में सभी को बुलाकर मिठाइयां बांटी थी। हम सबको सफल बनाने का श्रेय मां को ही है क्योंकि उन्हीं की गाइडेंस व संरक्षण में रहे पिता का तो रहता ही है पर मां का ज्यादा योगदान रहता है।
-प्रो. एस के सिंह, वाइस चांसलर, राजस्थान टेक्नीकल यूनिवर्सिटी कोटा
मां की प्रेरणा- जो काम करो उसमें टॉप लेवल तक जाओ
मां को हर बच्चे का पहला गुरु कहा जाता है। मेरी मां मधुबाला सक्सेना गवर्नमेंट टीचर थी और प्रिंसिपल के पद से रिटायर्ड हुई। वह टीचर थी तो उनमें यह खूबी थी कि किस तरह बच्चों को गाइड करते हुए आगे ले जाना है। टीचिंग की बेसिक शुरूआत उन्होंने घर से ही देनी शुरू की थी। वह शिक्षा के क्षेत्र ही नहीं हर फील्ड में माहिर थी। उनका सपना था कि डॉक्टर बनकर अपना हॉस्पिटल बनाए। मैं डॉक्टर भी बना, हॉस्पिटल भी बनाया लेकिन मम्मी उस समय तक सर्वाइव ही नहीं कर पाई । दो साल पहले वह हमारे बीच नहीं रही। उन्होंने हॉस्पिटल बनते हुए तो देखा पर पूरा बना हुआ नहीं देख पाई। यह मेरे मन में मलाल रहा। उनका ड्रीम यहीं था कि डॉक्टर बनकर मरीज का बेहतरीन इलाज करना है। किसी का पैसों के कारण इलाज नहीं रूके अगर कोई मरीज अस्पताल में आया है तो उसको बेहतरीन चिकित्सा उपलब्ध हो और समय पर इलाज शुरू हो जाए । जो भी काम करो उसमें टॉप लेवल तक जाओ वह इस बात की प्रेरणा शुरू से देती थी। मैंने हॉस्पिटल का नाम मधुवन पेरेन्ट्स के नाम पर ही रखा है । मां की पोस्टिंग दूर दराज गांवों में भी रही वह डेली अपडाउन करती थी पर कभी भी अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटीं। हम पांचो भाई बहनों को काबिल बनाया ।
-डॉ. विवेक सक्सैना, डायरेक्टर, मधुवन मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल, कोटा
मां ने सिखाया – कोई काम छोटा या बड़ा नहीं
मेरी मां पुरबी भट्टाचार्य का 59 की उम्र में देहांत हो गया था। वह बहुत क्वालीफाइड थीं हमेशा मेरे लिए प्रेरणा रहीं। उन्होंने हमें श्रम का महत्व समझाया, जीवन मूल्य, सामाजिक मूल्य सभी का सम्मान करने की शिक्षा दी। जब हम टीनऐज में थे तब बहुत अच्छे से साथ निभाया। मेरे पिताजी डॉक्टर थे आर्थिक रूप से सम्पन्न थे लेकिन कभी किसी दिन घर में काम करने वाली बाई नहीं आती थी तब मां हम तीनों भाइयों को एक-एक दिन करके बर्तन धोने को बोलती थी। इसके पीछे उनकी बहुत बड़ी सीख थी कि मन के अंदर कोई ईगो पैदा ना हो कि ये छोटा काम है या बड़ा काम । हर काम का अपना महत्व होता है।
– शांतनु भट्टाचार्य, सीओओ, केईडीएल कोटा