एक अदद सड़क को मोहताज राजधानी देहरादून का यह गांव! डोली…कंधे के सहारे ग्रामीणों का जीवन


हिना आज़मी/देहरादून. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के मुख्य शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए सरकार प्रयास करती रहती है लेकिन राजधानी की एक ग्राम पंचायत ऐसी भी है, जहां गाड़ियों को चलाना तो दूर पैदल चलने के लिए भी सड़क नहीं है. सुनीर गांव में आजादी के 76 साल बाद भी लोग सड़क से वंचित हैं.

चकराता ब्लॉक की समाजसेवी बचाना शर्मा ने बताया कि चकराता ब्लॉक के अंतर्गत इस गांव में कई समस्याएं हैं लेकिन सबसे बड़ी समस्या सड़क का न होना है. यहां के किसान अपनी सब्जियों को मुख्य बाजार में ज्यादा लागत से ले जाते हैं और इसका उनको आधा दाम ही मिलता है. उन्हें पीठ पर या खच्चर पर लादकर ही सामान ले जाना पड़ता है.

पथरीले रास्तों के कारण घर वीरान
स्थानीय निवासी मंदास ने बताया कि कच्चे रास्ते से ही सबको गुजरना पड़ता है. हम लोगों ने बड़ी मुश्किल से स्कूल में पढ़ाई की. बरसात के दिनों में काफी ज्यादा खतरा होता था क्योंकि एक तरफ ऊंचे पहाड़ और दूसरी ओर खाई. इस बीच पथरीले रास्तों से हमें गुजरना पड़ता था. हम अपने बच्चों को इस तरह की परेशानियों से गुजरते नहीं देख सकते, इसीलिए हम जैसे कई लोग अपने गांव को छोड़ त्यूणी में किराए पर कमरा लेकर रहते हैं और बच्चों को स्कूल में पढ़ाते हैं. ऐसे में गांव में हमारे घर वीरान हो जाते हैं. वहीं दिनेश का कहना है कि सड़क नहीं है, तो बच्चों के स्कूल से लेकर युवाओं तक के रोजगार की राह बंद नजर आती हैं. बिना सड़क हम शहर से गांव तक रोजाना अप डाउन नहीं कर सकते हैं, इसीलिए कई युवा शहर में जाकर ही पढ़ाई करते हैं और नौकरी कर रहे हैं.

डोली से ले जाते हैं मरीज
साहिब सिंह बताते हैं कि उनके परिवार के कई लोगों को उन्होंने खोया है. शहर से सुनीर गांव को जोड़ने के लिए एकमात्र यही सड़क है, जिसमें छोटी नहर है, जिस पर चढ़कर ही लोगों को जाना पड़ता है. अगर कोई व्यक्ति बुजुर्ग या बीमार है, तो उसके लिए शहर तक पहुंचना मुश्किल लगता है. सड़क न होने के चलते एम्बुलेंस यहां नहीं पहुंच सकती है,इसलिए चारपाई और डोली बनाकर ही मरीज को अस्पताल ले जाना पड़ता है.

दो भतीजों की कच्ची सड़क ने ली जान
साहिब सिंह बताते हैं कि गर्भवती महिलाओं के लिए यह बहुत ही दयनीय स्थिति है क्योंकि उन्हें हम कंधे पर भी नहीं ले जा सकते हैं. उनकी भाभी की इस रास्ते में चलने के दौरान टांग टूट गई थी और फिर इलाज में लाखों रुपये खर्च हुए. उनके दो बीमार भतीजे ने भी रास्ते में ही दम तोड़ दिया. सुनीर गांव से अस्पताल 20 से 25 किमी की दूरी पर स्थित है, जिसमें पक्की सड़क न होने के चलते उन्हें 9 से 10 किमी पैदल चलना पड़ता है.

सीएम पुष्कर सिंह धामी ने दिया आश्वासन
सड़क निर्माण की मांग को लेकर ग्रामीण मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से भी मिल चुके हैं. उन्होंने आश्वासन दिया है कि जल्द गांव को पक्की सड़क मिल जाएगी. संबंधित विभाग के अधिकारी गांव का मौका-मुआयना कर तेजी से आगे की कार्यवाही करेंगे.

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