सोनिया मिश्रा//चमोली. देवभूमि उत्तराखंड ने सदियों से लोक संस्कृति, लोककलाओं, लोकगाथाओं को संजोकर रखा है और यही बात इसे दूसरों से अलग बनाती है. ऐसी ही एक लोक संस्कृति है रम्माण, जिसने देवभूमि के दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्र से विश्व सांस्कृतिक धरोहर में अपना स्थान बनाया है. साथ ही जिसने आज भी अपने 500 वर्षों के इतिहास को संजोकर रखा है. चमोली जिले के दूरस्थ विकासखंड जोशीमठ में प्रत्येक वर्ष रम्माण उत्सव का धूमधाम से आयोजित किया जाता है.
इसमें रामायण से संबंधित विभिन्न विधाओं की ढोल दमाऊ की 18 तालों में प्रस्तुति की जाती है. इसे ‘मुखौटा नृत्य’ भी कहते हैं. यह रम्माण उत्सव बहुत ही आकर्षक होता है. इसी कारण से इसे विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया है. यह कार्यक्रम हर साल बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के समय यानि अप्रैल में आयोजित किया जाता है. साथ ही अभी तक दो बार 26 जनवरी गणतंत्र दिवस की परेड में भी शामिल किया जा चुका है.
धर्म के प्रचारके लिए शुरू हुआ नृत्य
इतिहासकार और क्षेत्रीय जानकार मोहन मैठाणी बताते हैं कि आदिगुरु शंकराचार्य ने देवभूमि में सनातन धर्म और अद्वैत सिद्वान्त के प्रचार-प्रसार के लिए शुरू से ही स्थानीय लोगों में भगवान राम और भगवान कृष्ण की लीलाओं के प्रति आस्था की जागृत की. स्थानीय लोगों ने इसे गायन, नृत्य के माध्यम से अपने उत्सव और पर्वों में शामिल किया. जिसके बाद मंचों पर भी भगवान की लीलाओं का मंचन शुरू हुआ. रम्माण भी इसी का एक उदाहरण है. इसी जोशीमठ ब्लॉक के सलूड़, डुंग्रा, डुंग्री, बरोशी, सेलंग इत्यादि गांवों में आज भी रम्माण उत्सव एक धार्मिक अनुष्ठान है, जिसका प्रतीक और नेतृत्व यहां के कुछ पौराणिक मुखौटे करते हैं.
2007 के बाद मिली पहचान
रम्माण उत्सव वर्ष 2007 तक एक निश्चित क्षेत्र तक सिमट कर रह गया था, जिसके बाद स्थानीय गांव के शिक्षक डॉक्टर कुशल सिंह भंडारी की मेहनत से रम्माण को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है. डॉक्टर भंडारी ने रम्माण को लिपिबद्ध कर इसका अंग्रेजी अनुवाद किया उसके बाद गढ़वाल विवि लोक कला निष्पादन केंद्र की सहायता से 2008 में दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र तक पहुंचाया और बाद में भारत सरकार ने यूनेस्को को भेज दिया. जिसका परिणाम यह हुआ कि रम्माण नृत्य को 2 अक्टूबर 2009 में विश्व विरासत सूची में शामिल कर लिया गया.
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FIRST PUBLISHED : November 9, 2023, 09:55 IST
