सुष्मिता थापा
बागेश्वर. कोरोना काल के बाद निजी स्कूल संचालकों की मनमानी एक बार फिर शुरू हो गई है. सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रमों को छोड़ निजी प्रकाशनों की किताबों को खरीदने का दबाव अभिभावकों पर बनाया जा रहा है. यही नहीं, निजी स्कूलों द्वारा अलग-अलग दामों से चिन्हित दुकानों से ही किताबें खरीदवाई जा रही हैं, जिनकी बिलिंग हजारों रुपये में की जा रही है. इसे वजह से बच्चों को पढ़ाना मुश्किल दिखाई दे रहा है.
पूर्व सरकार में तत्कालीन शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय ने ऐतिहासिक निर्णय लेकर सभी विद्यालयों में एनसीईआरटी की पुस्तकें लागू करने का निर्णय लिया था जिससे अभिभावकों को काफी राहत मिली थी. एनसीईआरटी की पुस्तकों और निजी प्रकाशनों की पुस्तकों के दामों में बीस से तीस गुना तक का अंतर है. इस बार भाजपा सरकार-2 बनते ही अरविंद पांडे के बजाय धनसिंह रावत को शिक्षा मंत्री का जिम्मा सौंपा. नई सरकार आते ही कई निजी विद्यालयों में एनसीईआरटी की पुस्तकों के अलावा अन्य निजी प्रकाशन की पुस्तकों को पाठयक्रम में शामिल कर दिया है. साथ ही प्रति वर्ष प्रवेश शुल्क के नाम पर अभिभावकों से जमकर फीस वसूली जा रही है, जिससे अभिभावकों का बजट गड़बड़ा रहा है, लेकिन जिला प्रशासन व शिक्षा विभाग के अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं.
शिकायत करने से घबराते हैं अभिभावक
निजी प्रकाशन की पुस्तकें लगाने से कई अभिभावक चर्चा कर रहे हैं, लेकिन शिकायत से घबरा रहे हैं. उनका कहना है कि शिकायत करने पर उनके बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ेगा.
वार्षिक शुल्क के नाम पर वसूली
यही नहीं, कई पब्लिक स्कूल प्रतिवर्ष बच्चों से एडमिशन चार्ज के रूप में हजारों रुपये वसूल रहे हैं. जबकि नियमों के मुताबिक, बच्चे से मात्र एक बार ही एडमिशन चार्ज लिया जा सकता है. वहीं, इस मामले पर जिला शिक्षा अधिकारी पदमेंद्र सकलानी ने कहा कि निजी पब्लिशर्स की पुस्तकें लागू करना गंभीर है. अभी किसी अभिभावक ने उनसे शिकायत नहीं की है. मैं शीघ्र स्कूलों का औचक निरीक्षण करूंगा. यदि कोई स्कूल निजी प्रकाशन की पुस्तकें मंगा रहा है तो उसकी शिकायत उनसे या प्रशासन से की जा सकती है. इसके साथ उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता का नाम गोपनीय रखा जाएगा.
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