कोटा। कहने को लाड़ो, असल में लडडू ही गोपाल…, यह मुहावरा नहीं बल्कि समाज के दोहरे चरित्र का आईना है। बेटियों को बराबरी का हक होने का एहसास तो कराया जाता है लेकिन जब साबित करने की बारी आती है तो समानता का आईना दोगलेपन की दरार से तड़क जाता है। आधुनिक युग में आज भी बेटों और बेटियों की शिक्षा में भेद किया जा रहा है। जिसकी गवाही सरकारी व प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का रिकॉर्ड खुद बयां कर रहा है। नवज्योति ने कोटा जिले के करीब 2 हजार सरकारी व प्राइवेट स्कूलों के पिछले चार सालों के आंकड़े खंगाले तो चौंकने वाली तस्वीर सामने आई। दरअसल, शिक्षा सत्र 2020-21 से 2023-24 तक जिले में कक्षा 9 से 12वीं में लड़कों के अनुपात में लड़कियों की संख्या में कमी आई है।
क्या कहते हैं आंकड़े
वर्ष लड़के लड़कियां
2020-21 37801 31185
2021-22 48531 29443
2022-23 53240 30823
2023-24 44588 25878
कक्षा 9 से 12वीं तक (सरकारी स्कूल)
वर्ष लड़के लड़कियां
2020-21 21617 25401
2021-22 24647 27995
2022-23 23832 27690
2023-24 22379 27321
50 हजार से अधिक लड़कियां घटी
शिक्षा विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार, कोटा जिले में सरकारी व प्राइवेट स्कूलों को मिलाकर कक्षा 9 से 12वीं तक छात्रों का कुल नामांकन 2 लाख 76 हजार 635 है। जबकि, लड़कियों का नामांकन 2 लाख 25 हजार 736 रही है। ऐसे में 50 हजार 899 बालिकाओं का नामांकन कम है। जबकि, बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में बेटियां ही अव्वल रहती हैं। ऐसे में सवाल उठता है, बेटियों ने कक्षा 8वीं के बाद बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी या फिर अभिभावक उन्हें पढ़ाने में रुचि नहीं दिखाते। बरहाल, कारण कुछ भी हो लेकिन शिक्षा की दर में बेटियों की संख्या घटना चिंताजनक है।
लाड़ों की घटती शिक्षा दर चिंताजनक
समाज में बेटा-बेटी के बीच फर्क काफी हद तक कम हुई है लेकिन भेद पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। शहरी के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में आज भी बेटियां उच्च शिक्षा से वंचित हैं। जबकि, अभिभावक बेटियों को बेटों के बराबर का हक देते हैं लेकिन जब साबित करने की बारी आती है तो बेटों को ही प्राथमिकता दी जाती है। शिक्षा के दर में बेटियों की कमी आत्मचिंतन को मजबूर करती है। शिक्षाविदों का मानना है, शिक्षा के दर में कमी के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें मुख्य कारण घर से स्कूल का दूर होना। जागरूकता का अभाव, माता-पिता का शिक्षित न होना, सुरक्षा की चिंता आदि शामिल है।
निजी स्कूलों में भी बेटियां कम
सरकारी ही नहीं प्राइवेट स्कूलों में भी बेटियों की संख्या में भारी कमी देखने को मिली है। यहां 1 लाख 84 हजार 160 लड़के अध्ययनरत हैं। जबकि, लड़कियों की संख्या 1 लाख 17 हजार 329 रही है। ऐसे में निजी स्कूलों में भी बालकों के अनुपात में 66 हजार 831 बालिकाएं कम हैं। हालांकि, सरकारी विद्यालयों में बेटियों की संख्या बेटों के मुकाबले 15 हजार 932 अधिक है।
क्या कहते हैं अभिभावक
मानसिकता में बदलाव की जरूरत
बेटा-बेटी के बीच फर्क कम तो हुआ है लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ। आज भी हर चीज में लड़कों को प्राथमिकता दी जाती है। जबकि, बेटियों को सब्र करना सीखाया जाता है। बेटियों की सुरक्षा को लेकर अभिभावक की चिंता भी शिक्षा की राह में बाधा बनती है। हालांकि, अभिभावक बेटियों को शिक्षित करने पर पहले की तुलना में वर्तमान में अधिक ध्यान देते हैं।
– रोडू लाल, अभिभावक, संजय नगर
क्या कहते हैं शिक्षाविद्
बेटियों को आज भी पराया धन माना जाता है, जबकि बेटों को बुढ़ापे की लाठी समझी जाती है। सरकारी स्कूलों में बेटियों का नामांकन बढ़ रहा है। सरकार बेटियों को शिक्षा से जोड़ने के लिए कई योजनाएं चला रही है। जिसका नतीजा है, सरकारी स्कूलों में बालिकाओं की संख्या में साल दर साल इजाफा हो रहा है।
– तेज कंवर, संयुक्त निदेशक, स्कूल शिक्षा कोटा संभाग
जीवन का कोई भी पहलु इससे अछूता नहीं है। चाहे वो शिक्षा, कॅरियर, जीवन साथी चुनने की आजादी, संपत्ति व निर्णय लेने का अधिकार ही क्यों न हो। हालांकि बदलाव हुआ लेकिन बहुत कम। अधिकतर परिवार लड़कों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने को प्राथमिकता देते हैं। लड़कियों को पराया धन मान उनपर खर्च करना फिजूल खर्च समझा जाता है। बेटियों की संख्या घटना चिंताजनक है। ग्रामीण इलाकों में आज भी बेटियों को 8वीं के बाद पढ़ाया नहीं जाता। घर से स्कूल दूर होना बड़ी वजह हो सकती है, जिससे अभिभावकों में असुरक्षा का भाव जाग्रत होता है।
– डॉ. ज्योति सिडाना, समाजशास्त्री, जेडीबी आर्ट्स कॉलेज
स्कूलों में लड़कियों की संख्या कम होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। आर्थिक तंगी व असुरक्षा का भाव इसका बड़ा कारण हो सकती है। लेकिन बदलाव हुआ है, सरकार ने जगह-जगह स्कूल खोल दिए हैं, बालिकाओं के लिए कई योजनाएं भी चला रखी है। माता-पिता में जागरूकता की कमी भी कारण है।
– सूर्य कुमार, अभिभावक, भीमगंजमंडी
