सोनिया मिश्रा/ चमोली.देवभूमि उत्तराखंड में वैसे तो कई प्रतिभाएं हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक राज्य की लोककला व लोक संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया है. उन्हीं में से एक हैं जागर गायिका पम्मी नवल, जिन्होंने देव जागरों को गाकर सभी के बीच अपना लोहा मनवाया है. गंगू रमोला, पंडों की पंचकेदार जात्रा, अनुसूया माता जागर, गंगा स्नान, जगदी जोन, नंदा देवी, देवी देवरों आयों चि, जैसे प्रसिद्ध जागर गाने वाली लोकगायिका पम्मी नवल चमोली जिले के बंड परगने के नौ गांव बंड पट्टी के गांव गड़ी (अगरथल्ला) की रहने वाली हैं. वह पेशे से शिक्षिका होने के साथ साथ जागर गायिका भी हैं. उन्हें जागर गाने का हुनर अपने माता पिता से विरासत में मिला. पम्मी बताती हैं कि उन्हें स्कूल के समय से ही लोक संगीत और गीतों में काफी रुचि थी, इसलिए वह स्कूल के दिनों से ही इससे जुड़ी प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करती थीं. जिसके बाद से यह शौक लगातार जारी रहा. शादी के बाद ससुराल वालों और पति के सहयोग से वह आज जागर गायिका के रूप में जानी जाती हैं.
‘हूं रैणी को दिन’ से मिली पहचान
लोक संस्कृति के पुरोधा गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी और लोक गायिका रेखा धस्माना को अपना आदर्श मानने वाली पम्मी नवल ने काफी संघर्ष किया है. जिसके बाद 2000 में इनकी पहली कैसेट ‘बाडुली’ सरस्वती कंपनी के माध्यम से लोगों के बीच आई, जिसे काफी सराहना मिली. इसके बाद पम्मी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. पम्मी द्वारा गाई गई पहली ही जागर ‘हूं रैणी को दिन, तुरैणी निभीगे’ ने जबरदस्त धूम मचा दी. इस जागर ने पहाड़ के हर गांव में धूम मचाई. उन दिनों कोई भी आयोजन ऐसा नहीं होता था, जिसमें यह जागर नहीं बजता हो. इस जागर ने पम्मी नवल को जागर गायिका के रूप में स्थापित कर दिया.
जागर में प्रसिद्धि मिलना है सपना
पम्मी नवल ने कहा कि वह अपनी लोक संस्कृति का प्रचार-प्रचार लगातार जागर पांडवाणी के माध्यम से कर रही हैं और भविष्य में भी वह इन्हीं के संरक्षण के लिए काम करती रहेंगी.
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FIRST PUBLISHED : November 23, 2023, 18:05 IST
