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Shailesh Matiyani Uttarakhand: शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार-2024 के लिए 16 शिक्षकों को सम्मानित करने की घोषणा की गई है. अल्मोड़ा में जन्मे शैलेश मटियानी ने संघर्षों के बीच हिंदी साहित्य को नई दिशा दी. र…और पढ़ें
शैलेश मटियानी ने दी थी हिंदी साहित्य को एक नई दिशा.
देहरादून. उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार-2024 के लिए 16 शिक्षकों को सम्मानित करने की घोषणा की है. यह पुरस्कार उत्तराखंड के उस महान साहित्यकार के नाम पर दिया जाता है, जिन्होंने समाज की जमीनी सच्चाइयों को अपनी लेखनी में उतारा और हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी. आइए, एक नजर डालते हैं उनके जीवन से जुड़ी यात्रा पर. 14 अक्टूबर 1931 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना गांव में जन्मे शैलेश मटियानी, जिनका असली नाम रमेश चंद्र सिंह मटियानी था, बचपन से ही संघर्षों से जूझते रहे.
शैलेश मटियानी जब 12 वर्ष के थे, तभी माता-पिता का साया सिर से उठ गया. पांचवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़नी पड़ी और चाचा के संरक्षण में उनका पालन-पोषण हुआ लेकिन उनका मन कभी भी सीमित दायरों में बंधकर नहीं रहा. संघर्षों से जूझते हुए उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा पास की और 1951 में रोजगार की तलाश में दिल्ली पहुंचे लेकिन दिल्ली की गलियां उनके सपनों के लिए संकरी पड़ गईं, तो वह बंबई (मुंबई) चले गए, फिर अल्मोड़ा और दिल्ली होते हुए इलाहाबाद पहुंचे. कई शहरों की यात्रा, कई जगहों पर संघर्ष लेकिन उनके अंदर एक आग जल रही थी, जो शब्दों में ढलकर समाज को रोशन करने वाली थी.
लेखन की शुरुआत और हिंदी साहित्य में योगदान
1950 से ही उन्होंने कविताएं और कहानियां लिखनी शुरू कर दीं. शुरुआती दिनों में वह ‘रमेश मटियानी शैलेश’ नाम से लिखते थे. उनकी शुरुआती कहानी ‘रंगमहल’ और ‘अमर कहानी’ पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं. 1961 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘मेरी तैंतीस कहानियां’ प्रकाशित हुआ. मटियानी की कहानियों में समाज की असली तस्वीर झलकती थी. ‘डब्बू मलंग’, ‘पोस्टमैन’, ‘रहमतुल्ला’, ‘प्यास और पत्थर’, ‘महाभोज’ जैसी कृतियां समाज की सच्चाइयों को बेबाकी से पेश करती हैं. ‘महाभोज’ उनकी सबसे चर्चित रचनाओं में से एक है, जिस पर नाटक और फिल्म भी बने.
साहित्य में योगदान के लिए सम्मान
शैलेश मटियानी का साहित्यिक योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया. उनके प्रथम उपन्यास ‘बोरीवली से बोरीबंदर तक’ को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सम्मानित किया गया. इसके अलावा उन्हें प्रेमचंद पुरस्कार, फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार, लोहिया सम्मान और राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.
2001 में अलविदा कह गए शैलेश मटियानी
अपनी लेखनी से समाज की सच्चाई उजागर करने वाले शैलेश मटियानी का जीवन अंत में बेहद दुखद रहा. 24 अप्रैल 2001 को दिल्ली के शहादरा अस्पताल में उनका निधन हो गया. एक ऐसा साहित्यकार, जिसने जीवनभर समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज उठाई, खुद अंत में उपेक्षा का शिकार हो गया. आज भी उनकी कहानियां समाज की सच्चाई का आईना हैं. शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार के माध्यम से उत्तराखंड सरकार उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही है ताकि शिक्षा और साहित्य का वह उजाला, जो उन्होंने फैलाया था, आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता रहे.
