कभी आदिवासियों के चेहरे पर होती थी यह फेस पेंटिंग...आज हर किसी में है इसका क्रेज


हिना आज़मी/ देहरादून. पुरापाषाण काल से ही मानव का रुझान कला के प्रति था. तब से लेकर अब तक चित्रकला की कई विधाएं चली आ रही हैं. आज भी दुनिया की कई जगहों के आदिवासियों के चेहरे पर चित्रकला देखी जाती है. वहीं कई तरह के फेस्टिवल्स, प्रोग्राम या जागरूकता अभियान में फेस पेंटिंग की जाती हैं. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के मयूर विहार की रहने वाली अदन शेख कई तरह की खूबसूरत पेंटिंग्स करती हैं. वह बॉटल पेंटिंग्स, केनवास पेंटिंग्स के अलावा फेस पेंटिंग भी करती हैं, जिन्हें छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग तक बनवाना पसंद करते हैं.

अदन शेख ने Local 18 को जानकारी देते हुए कहा कि उन्हें पेंटिंग्स करने का काफी शौक था. वह राजभवन में अपनी पेंटिंग्स लेकर आई थीं. वहीं उन्होंने सोचा क्यों ना फेस पेंटिंग की जाए. उन्होंने ऐसा ही किया और लोगों को उनसे फेस पेंटिंग करवाना बहुत अच्छा लगा. वह स्कूल, कॉलेज और कई इवेंट्स में फेस पेंटिंग्स करती हैं. वह बताती हैं कि युवाओं में तो फेस पेंटिंग का क्रेज है ही बल्कि कई बुजुर्ग भी उनसे फेस पेंटिंग करवाने के लिए आते हैं और बच्चों में तो इसके प्रति बहुत रुझान देखा गया है. तीन साल के बच्चे भी इन रंगों डिजाइन को देख उनके पास खिंचे चले आते हैं. वह इवेंट के थीम के मुताबिक फेस पेंटिंग करती है, जैसे अगर कोई पर्यावरण के प्रति जागरूकता को लेकर इवेंट हो रहा है, तो उसमें पेड़ पौधे धरती आदि को शामिल करती हैं, जबकि अगर कोई म्यूजिक इवेंट हो रहा है, तो उसमें गिटार और अन्य म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट आदि को शामिल किया जाता है. अगर आप भी फेस पेंटिंग करवाना चाहते हैं या कोई जानकारी लेना चाहते हैं, तो आप अदन शेख के इंस्टाग्राम अकाउंट @the_dreamybrush पर उनसे संपर्क कर सकते हैं.

फेस पेंटिंग का इतिहास

माना जाता है कि फेस पेंटिंग्स ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के मूल निवासियों से दुनियाभर में पहुँची. दरअसल, यहां के जंगलों के रहने वाले आदिवासी उत्सव, समारोहों के दौरान वह मिट्टी, लकड़ी का कोयला और अन्य प्राकृतिक रंगों से चेहरे और शरीर को सजाते थे. इसके बाद व्यक्ति के चेहरे और शरीर को सजाने के लिए नॉन-टॉक्सिक पेंट का प्रयोग होने लगा.

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