कमल पिमोली/ श्रीनगर गढ़वाल.लोकसंगीत के क्षेत्र में दिया जाने वाला उस्ताद बिस्मिला खां राष्ट्रीय पुरस्कार से उत्तराखंड के श्रीनगर गढ़वाल में कार्यरत दंपति सम्मानित होंगे. संगीत नाट्य अकादमी द्वारा 2022-23 के लिए दिये जाने वाले पुरस्कारों के नाम की घोषणा की गई थी, जिसमें लोक संगीत के लिए डॉ संजय पांडेय व लता तिवारी का नाम भी शामिल है. ये दंपति श्रीनगर गढ़वाल में कार्यरत हैं और बीते लंबे समय से गढ़वाल कुमाऊं के लोक संगीत को संजोने का कार्य कर रहे हैं. जल्द दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों यह दंपति सम्मानित होंगे. यह पहला मौका होगा, जब किसी दंपति को एक साथ यह पुरस्कार दिया जायेगा.
डॉ संजय पांडेय जहां गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के लोक कला एवं निस्पादन केन्द्र में शिक्षक हैं, तो वहीं डॉ लता तिवारी पांडे जीआईसी श्रीनगर में संगीत की शिक्षिका है. अपनी प्रोफेशलन लाइफ, पर्सनल लाइफ के बीच समय निकालकर यह दंपति बीते 15 सालों से उत्तराखंड के लोक और मांगल गीतों पर कार्य कर रहे हैं.
15 सालों से लोकगीत पर कार्य
डॉ संजय पांडेय जानकारी देते हुए बताते हैं कि बीते 15 सालों से वे लोक संगीत पर कार्य कर रहे हैं. उन्होंने शास्त्रीय संगीत से शुरुआत की थी, लेकिन फिर लगा कि शास्त्रीय संगीत पर तो हर कोई कार्य कर रहा है, क्यों न लोक संगीत पर कार्य किया जाये. यह ख्याल आते ही लोक संगीत पर कार्य करने का मन बना लिया व पहाड़ की विभिन्न लोकगीतों को सीखा. डॉ पांडे बताते हैं कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति बेहद समृद्ध है लेकिन बदलते वक्त के साथ लोग इसे भूल रहे हैं. वह कहते हैं कि बेड़ा गीत, मांगल गीत, चैती गीत समेत अन्य पारंपरिक गीतों को सीखकर अन्य लोगों व नई पीढ़ी तक भी पहुंचाया जा रहा है. इसे वह अपनी जिम्मेदारी समझते हैं कि आने वाली पीढ़ी को उत्तराखंड के लोक संगीत की जानकारी दी जाए.
गढ़वाली बोली में सरस्वती वंदना की रचना
जीआईसी श्रीनगर में संगीत विषय की शिक्षिका डॉ लता पाण्डेय की गंगा रचना पर पूर्व सीएम त्रिवेंद्र रावत द्वारा 51 हजार रुपये का पुरस्कार भी दिया गया था. डॉ लता ने स्कूली बच्चों के लिए गढ़वाल बोली में प्रार्थना भी लिखी है. वह बताती हैं कि एक समय ऐसा होता है, जब आप पढ़ रहे होते हैं, सीख रहे होते हैं, तब आप जो चाहे वह कर सकते हैं. लेकिन नौकरी, शादी के बाद यह सब कर पाना संभव नहीं हो पाता है. ऐसे में समय निकाल पाना बड़ा मुश्किल होता है, लेकिन वे आज भी गढ़वाल और कुमाऊं के लोकगीतों को सीखने की कोशिष कर रही हैं. वह कहती हैं कि गढ़वाल व कुमाऊं दोनों मंडलों में चैती, मांगल गीत गाये जाते हैं, इनमें भाव तो एक है लेकिन गायन शैली अलग है, ऐसे में दोनों गीतों को वे सीख रही हैं और दूसरों को भी सिखा रही हैं.
एक दूसरे का साथ अहम
संजय पांडेय कहते हैं कि एक ही घर में जब दो लोग एक ही विधा के होते हैं, तो काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. शादी के बाद बच्चों को संभालना, नौकरी करना और इस बीच लोकसंगीत को समय देना बड़ा कठिन था लेकिन आपसी सामंजस्य व एक दूसरे के सहयोग से यह मुमकिन हो पाया है.
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FIRST PUBLISHED : February 29, 2024, 16:13 IST
