कमल पिमोली/श्रीनगर गढ़वाल: उत्तराखंड म्यूजिक इंडस्ट्री इस वक्त उन इंडस्ट्री में से एक है, जो ग्लोबली देखे और सुने जा रहे हैं. हाल ही में उत्तराखंड संगीत जगत से रिलीज हुए कई गाने दुनियाभर में धूम मचा रहे हैं. इंस्टाग्राम, फेसबुक रील्स पर गुलाबी सरारा, पहाड़ों को रैबासी जैसे गीत ट्रेंड कर रहे हैं. ऐसे में इन गीतों को गाने वाले गायकों की लोकप्रियता में भी इजाफा देखने को मिला है. ‘पहाड़ों को रैबासी’ फेम सौरव मैठाणी लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. उनके कॉन्सर्ट में हजारों की संख्या में भीड़ देखने को मिल रही है. बेहद कम उम्र में सौरव मैठाणी ने खुद को उत्तराखंड के जाने माने गायकों की लिस्ट में शामिल कर लिया है
मूलरूप से रुद्रप्रयाग जिले के रहने वाले सौरव मैठाणी उत्तराखंड संगीत जगत के जाने-माने चेहरा बन चुके हैं. सौरव मैठाणी की प्रारंभिक शिक्षा कुवीला खाल गांव में ही हुई है. इसके बाद उन्होंने देहरादून से हाई स्कूल व उच्च शिक्षा हासिल की, यहां उन्होंने संगीत की बारीकियां सीखी, उनकी मां भी एक लोक गायिका हैं, अपनी मां से उन्होंने संगीत के गुण सीखें व आज संगीत जगत में खुद को स्थापित कर चुके हैं. एक के बाद एक हिट देने वाले सौरभ मैठाणी के गीतों में पहाड़ की संस्कृति की झलक दिखती है. जब सौरभ मैठाणी गीत गाते हैं, तो हर कोई झूमने पर मजबूर हो जाता है.
गीतों में दिखता है पहाड़
गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल पहुंचे सौरभ मैठाणी ने लोकल 18 से खास बातचीत में बताया कि उनका एक नया गाना जल्दी ही रिलीज होने वाला है. जिसमें पहाड़ को लेकर एक बहुत बड़ा मैसेज भी लोगों तक पहुंचेगा. उन्हें उम्मीद है कि इस गीत को भी उतना ही प्यार मिलेगा. जितना पहाड़ों को रैबासी गीत को मिला है.’पहाड़ों को रैबासी’ गीत की सक्सेस को लेकर सौरभ मैठाणी कहते हैं कि यह गीत उनके दिल के काफी करीब है. साथ ही इसमें उस दौर के पहाड़ का वर्णन किया गया है. जब लैंप जलाकर गांवों में रोशनी होती थी, साथ ही वह पहाड़ व शहर के जीवन की एक व्यंगात्मक तुलना गीत के माध्यम से किये हैं.
ग्लोबली पहाड़ी गीतों को लोग कर रहे पसंद
आगे बताते हैं कि ‘पहाड़ों को रैबासी’ गाने को दर्शकों द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है. हर कोई इस गाने पर रील्स बना रहा है. अब तक 6 हजार से अधिक कमेंट इस गाने पर आ चुके हैं. जिसमें से एक भी नेगेटिव कमेंट नहीं है. वहीं यूट्यूब पर 55 लाख से अधिक लोग गाने को देख चुके हैं. यह एक सुखद संकेत हैं कि अब केवल उत्तराखंड ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों में भी लोग पहाड़ी गानों को पसंद कर रहे हैं.
गीतों में न हो फूहड़ता
सौरव मैठाणी कहते हैं कि वह ऐसा गीत बनाना चाहते हैं. जिसमें पहाड़ की संस्कृति दिखे, फिर चाहे शराब, नशे पर हो, प्राकृतिक सौंदर्यता पर या लड़की के श्रृगार पर गीत हो तो उसमें यह ध्यान रखना अनिवार्य है कि गीत में किसी तरह की अभद्रता न आए. क्योंकि हम देवभूमि उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व अपने गीतों के माध्यम से करते हैं. लिहाजा नये गायकों को भी इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि ऐसे गीतों को गाने से बचा जाए. जिससे कि देवभूमि की अस्मिता पर आंच आये.
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FIRST PUBLISHED : March 26, 2024, 15:28 IST
