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Janmashtami 2023: श्रीनगर गढ़वाल में जन्माष्टमी की धूम, राधा-कृष्णा बने नन्हें बच्चे
कमल पिमोली/श्रीनगर गढ़वाल. सांस्कृतिक धरोहरों को संभाले गढ़वाल क्षेत्र की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले श्रीनगर गढ़वाल में बड़े ही धूम-धाम से कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. शायद ही ऐसा कोई त्यौहार हो, जिसे यहां हर्षों उल्लास के साथ न मनाया जाए. जनमाष्टमी से पहले श्रीनगर गढ़वाल में जन्माष्टमी की धूम देखने को मिल रही है, जहां बाजार सज चुके हैं. तो वहीं कृष्ण के पोशाक की बिक्री भी शुरू हो गई है. स्कूलों में जन्माष्टमी के अवसर पर कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है. जहां छोटे-छोटे बच्चे कृष्ण की वेशभूषा में सजे हुए दिख रहे हैं तो वहीं ... Read more
फेमस है घंटी वाले भैया की चाट, टिक्की और दही भल्ले, 11 साल से परोस रहे हैं एक जैसा स्वाद, ये है लोकेशन
कमल पिमोली/श्रीनगर गढ़वाल. ना कोई लग्जरी रेस्टोरेंट, न ही कोई आकर्षक डेकोरेशन, लेकिन स्वाद ऐसा कि हर कोई बोलता है “घंटी वाले भैया पहले मेरी बारी”. श्रीनगर गढ़वाल की सब्जी मंडी वाली गली में अपनी चाट की दुकान लगाने वाले घंटी वाले भैया के चाट की दीवानगी इतनी है कि यहां युवाओं का तांता लगा रहता है, यहां युवाओं से लेकर बड़े बुर्जुग और छोटे बच्चे भी गोलगप्पे, टिक्की को काफी पसंद करते हैं, आलम यह है कि यहां चाट की ठेली लगने के तुरंत बाद से ही ग्राहकों का जुटना शुरू हो जाता है. यहां युवाओं में फास्ट फूड ... Read more
फेमस है घंटी वाले भैया की चाट, टिक्की और दही भल्ले, 11 साल से परोस रहे हैं एक जैसा स्वाद, ये है लोकेशन
कमल पिमोली/श्रीनगर गढ़वाल. ना कोई लग्जरी रेस्टोरेंट, न ही कोई आकर्षक डेकोरेशन, लेकिन स्वाद ऐसा कि हर कोई बोलता है “घंटी वाले भैया पहले मेरी बारी”. श्रीनगर गढ़वाल की सब्जी मंडी वाली गली में अपनी चाट की दुकान लगाने वाले घंटी वाले भैया के चाट की दीवानगी इतनी है कि यहां युवाओं का तांता लगा रहता है, यहां युवाओं से लेकर बड़े बुर्जुग और छोटे बच्चे भी गोलगप्पे, टिक्की को काफी पसंद करते हैं, आलम यह है कि यहां चाट की ठेली लगने के तुरंत बाद से ही ग्राहकों का जुटना शुरू हो जाता है. यहां युवाओं में फास्ट फूड ... Read more
विभाग ने बंद किया 123 साल पुराना सरकारी स्कूल, ग्रामीणों ने जबरन खुलवाया
जिले में सिर्फ सिरपोली ही नहीं और भी ऐसे कई स्कूल हैं जहां शिक्षा विभाग समय के साथ ना तो इन विद्यालयों के भवन सुधार पाया है और ना ही यहां की शिक्षा व्यवस्था को, जिससे आज पहाड़ों में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना एक बड़ी चुनौती बन गया है.