नेता, माफिया, अफसरों के मजबूत गठजोड़ से फल-फूल रहा टिंबर माफियाओं का कारोबार


हाइलाइट्स

उत्तराखंड के इलाकों में सालों से टिंबर माफिया अपनी मजबूत जड़ें जमाए बैठा है
टिंबर माफिया के पीछे प्रभावशाली नेताओं का भी कनेक्शन है

देहरादून. हिमाचल बॉर्डर से लगे उत्तराखंड के इलाकों में सालों से टिंबर माफिया अपनी मजबूत जड़ें  जमाए बैठा है. टिंबर की दुनिया में सत्ता, माफिया और ऑफिसर का ऐसा मजबूत गठजोड़ बना हुआ है कि तमाम नियम कानूनों के बावजूद टिंबर का अवैध कारोबार यहां खूब फल-फूल रहा है. टिंबर माफिया के पीछे प्रभावशाली नेताओं का भी कनेक्शन है. इसमें बड़े पैमाने पर विभागीय कर्मचारी भी शामिल हैं. इस मजबूत गठजोड़ में जौनसार भाबर के इस इलाके में प्रचलित नमक-लोटा प्रथा को भी टिंबर माफिया ने अपना मजबूत हथियार बनाया हुआ है.

इस एक महीने में हिमाचल से लगे उत्तराखंड के चकराता, कालसी और उत्तरकाशी के टौंस वन प्रभाग में बड़े पैमाने पर जंगलों के अवैध कटान के मामले सामने आए हैं. चकराता के तीन गावों से देवदार के करीब छह हजार स्लीपर बरामद किए गए है. विभागीय जांच बैठी तो इसमें टीचर , सहायक विकास अधिकारी और वन विभाग के अफसरों, कर्मचारियों की मिली भगत सामने आई. चकराता मामले में वन विभाग ने प्राथमिक जांच के आधार पर अपने छह अधिकारी और कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया है. जांच गंभीरता से हुई तो इसमें वन विभाग के पूर्व में यहां तैनात रहे डीएफओ लेवल के अफसरों पर भी गाज गिर सकती है.

सरकारी कर्मचारी भी लकड़ी के अवैध कारोबार में लिप्त थे, जिनके पास से स्लीपर बरामद किए गए, वो नाम आपको चौंका सकते हैं. वन विभाग ने पेड़ों के अवैध कटान में शामिल 20 लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई है. इनमें जो पहला नाम है वो है केशर सिंह चौहान का. केशर सिंह चौहान राजकीय पूर्व माध्यमिक विधालय का प्रिसिपल है यानि सरकारी कर्मचारी है. उसके पास यहीं पर मौजूद प्राथमिक विधालय का भी चार्ज है. केशर सिंह चौहान ने दोनों स्कूल भवनों में लकड़ी के स्लीपर छुपा के रखे थे. दूसरा नाम है राजेश नेगी. राजेश नेगी सहायक विकास अधिकारी, पंचायत के पद पर तैनात है. लेकिन वो यहां लकड़ी का अवैध कारोबार कर रहा था.

गांव का स्याणा ही टिंबर माफिया निकला
तीसरा जो नाम है फते सिंह, ग्राम मशक. फते सिंह मशक गांव का स्याणा भी है. चकराता के इन क्षेत्रों में स्याणा की परंपरा आज भी कायम है. स्याणा यानि की गांव का मुखिया. गांव के हर छोटे बड़े विवाद स्याणा निपटाता है. इन क्षेत्रों में कोर्ट से ज्यादा स्याणा का आदेश माना जाता है. मशक गांव का यह स्याणा ही लकड़ी के अवैध कारोबार में लिप्त था. उसके घर से बड़े पैमाने पर देवदार के स्लीपर बरामद हुए हैं. माना जा रहा है कि ये पूरा अवैध कारोबार सालों से चला आ रहा था, जिसमें वन विभाग के छोटे से लेकर बड़े ऑफिसर तक भी शामिल थे. कारोबार फलने फूलने का एक बड़ा कारण ये भी है कि इन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था. यहां विभागों में कार्यरत अधिकांश कर्मचारी लोकल हैं. वन विभाग में रेंजर से लेकर फॉरेस्टर , फॉरेस्ट गार्ड सभी लोकल स्टॉफ हैं. राजनीतक संरक्षण के कारण इनके ट्रांसफर की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाता. और यही लोग टिंबर माफिया के लिए कड़ी का काम करते हैं.चकराता में लकड़ी के इस अवैध कारोबार में जब जांच हुई , कर्मचारी सस्पेंड किए गए, तो मामले में जो खुलासा हुआ उसने सबको चौंका दिया. यहां टिंबर माफिया, उनके श्रमिकों और वन विभाग के कर्मचारियों के बीच “नमक लोटा” किया गया था. जिसके कारण पेडों के अंधाधुंध कटान के बावजूद वन विभाग का कोई कर्मचारी मुंह नहीं खोलता था. ये कर्मचारी टिंबर माफिया के लिए मुखबरी का भी काम करते थे. चकराता की डीएफओ कल्याणी द्वारा शासन को भेजी गई विभागीय जांच रिपोर्ट में नमक लोटा का जिक्र किया गया है.

क्या होता है नमक लोटा
दरअसल, जौनसार बावर का यहा इलाका जनजातीय क्षेत्र है. यहां आज भी नमक लोटा प्रथा पर लोगों का गहरा विश्वास है. पहले आपको बताते हैं क्या होती है नमक लोटा प्रथा. नमक लोटा प्रथा में लोटे में नमक डलवाकर आदमी को वचनबद्व कर लिया जाता है. एक लोटे (बर्तन) में जल लेकर ईश्वर को साक्षी मानते हुए सामने वाले व्यक्ति से लोटे में नमक डलवाया जाता है. मान्यता है कि यदि नमक डालने वाला व्यक्ति वायदा खिलाफी करता है, तो उसका शरीर भी वैंसे ही गल जाता है, जैसे पानी में नमक घुल गया . ये परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. बताते हैं कि इसे कभी गांव समाज में आपसी विवाद निपटाने, समाज में एक राय स्थापित करने के लिए शुरू किया गया था. जौनसार के इन इलाकों में चुनाव में नेता इसका खूब लाभ उठाते हैं. गांव के गांव में वोटरों से नमक लोटा कराया जाता है.

मुंह खोला तो टिंबर माफिया का निशाना बन जाता है आदमी
जौनसार के इन इलाकों में टिंबर माफिया का बड़ा साम्राज्य है. कोई भी माफिया के खिलाफ मुंह खोलने को तैयार नहीं होता. कई लोग सजा के तौर पर अपनी जान तक गंवा चुके हैं. चकराता फॉरेस्ट डिविजन की जिस रेंज से देवदार के अवैध स्लीपर बरामद हुए वो है कनासर रेंज. इस रेंज में कई हत्याएं हो चुकी हैं, जिन्हें चुपचाप दुर्घटना का नाम दे दिया गया. नाम न छापने की शर्त पर पूर्व में यहां तैनात रहे फॉरेस्ट के एक अफसर कहते हैं कि पिछले साल इसी कनासर रेंज के बुधेर सेकिंड कंपार्टमेंट में 36 साल का फॉरेस्ट गार्ड नंदू रावत खाई में मरा हुआ पाया गया था. फॉरेस्ट अफसर कहते हैं इसे एक दुर्घटना बताया गया. लेकिन, मैं पूरी तरह कान्फिडेंट हूं कि ये टिंबर माफिया द्वारा की गई हत्या थी.दरअसल, नंदू रावत 18 साल की उम्र में वन विभाग में दैनिक श्रमिक के तौर पर आया था. अब तक टिंबर माफिया उसका यूज करता था, लेकिन पिछले ही साल नंदू विभाग में परमानेंट होकर फॉरेस्ट गार्ड बन गया. फॉरेस्ट गार्ड बनते ही नंदू के कंधों पर जब जिम्मेदारी आ गई तो उसने टिंबर माफिया के लिए रोक टोक करने लगा और फिर एक दिन नंदू जंगल में ही खाई में मरा पाया गया. इससे पहले भी कनासर रेंज में दो ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं.

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